Monday, December 2, 2019

ड़र...


ड़र... दिल और दिमागपर कब्ज़ा करनेवाला होता है, ड़र... | ड़र सिर्फ राक्षस, आत्मा या भूत-प्रेत का नहीं होता | ड़र के और भी पहलू होते हैं | किसी अनहोनी घटना के होने का ड़र, खुद को खुद से खोने का ड़र... आवाज़ को चीरकर फैलते सन्नाटे का ड़र, रौशनी को झाँकते काले अँधेरे का ड़र... | ड़र इंसान के दिल और दिमाग़पर इस क़दर हावी हो जाता है, कि इंसान अपनी सोच-समझ खो बैठता है | ड़र में घिरा इंसान वही देखता है, जो ड़र उसे दिखाता है | कुछ ऐसा ही हादसा रवी के साथ हुआ |

"रवी... रवी..." पढ़ने में मग्न रवी इस आवाज़ से चौंक गया | आवाज़ घर के अंदर से आ रही थी | "घर में तो मैं अकेला हूँ, तो यह दूसरी आवाज़ किसकी है..." इस ख़याल से रवी का मन विचलीत हो उठा और वह आवाज़ की ओर चल पड़ा | अंधेरे में लड़खड़ाते हुए आवाज़ जिस कमरे से आई थी, उस कमरे रवी पहुँचा | रवी यहाँ-वहाँ देख ही रहा था कि, "रवी... आ गये तुम..." आवाज़ सुनते ही रवी चौंक गया और तुरंत आवाज़ की ओर मुड़ा |

रवी ने आवाज़ की ओर देखा | सामने आइना था और उसमें रवी को खुद रवी ही दिख रहा था | वह रवी का अक्स था | मोबाईल की धिमी रौशनी में वह अक्स रवी को कुछ अलग दिख रहा था | रवी शांत था, लेकिन वह अक्स हस रहा था | रवी तुछ बोले इससे पहले वह अक्स बोल पड़ा, "रवी... तुम्हें मैंने यहाँ क्यौं बुलाया जानते हो... कुछ ही देर में समझ जाओगे..." यकायक रवी के पीछे की दीवार फाड़कर दो हाथ बाहर निकले और उन्होंने रवी की गर्दन दबोच ली |

हड़बड़ाकर रवी बिस्तर पर उठ बैठा | पसीने से लथपथ रवीने घडी देखी | रात के बारह बज चुके थे | टि.वी. चल रहा था लेकिन स्क्रीन काली पड़ी थी | "इसका मतलब... टि.वी. देखते देखते मैं सो गया और सपने में यह सब देखा |" खुद से बड़बड़ाते हुए रवी ने सी.ड़ी. निकाली, टि.वी. बंद किया और वापस सोने चला गया |

बहुत देर तक रवी करवटें बदलता रहा लेकिन सपने कि वजह से या जो देखा उसके ड़र की वजह से रवी को नींद ही नहीं आ रही थी | तभी उसे पानी के टपकने की आवाज़ आई | रवी ने ध्यान से सुना | आवाज़ बाथरूम से आ रही थी | "मैंने तो सारे नल बंद किये थे... तो यह पानी कैसे टपक रहा है..." यह खयाल मन में आते ही रवी सहम गया | वह धीरे-धीरे बाथरूम की ओर बढ़ा | खुलते दरवाजे की आवाज़ से उसका मन और घबरा गया | रवी अंदर झाँका | नल का पानी नीचे रखी बालटी में टपक रहा था | रवी ने गहरी साँस ली | नल बंद कर वह मुड़ा |

रवी को आइने में एक छबी दिखाई दी | वह एक औरत की छबी लग रही थी | उसके उड़नेवाले खुले बाल तो दिख रहे थे लेकिन चेहेरा नज़र नहीं आ रहा था | निशब्द होकर रवी उस छबी की ओर देख रहा था | रवी ने सोचा, "आइने में दिख रही है, इसका मतलब यह जो भी है, मेरे पीछे...|" पसीने की एक बूँद कवी के कानों के पीछे से आने लगी | आइने से नज़र हटाकर रवी धीरे से पीछे मुड़ा | वहाँ कोई नहीं था | रवी ने झट से आइने की तरफ देखा तो वह छबी भी गायब हो चुकी थी | ड़र के मारे रवी पसीने में तरबतर हो गया था | बाथरूम का दरवाजा बंद कर वह झट से बिस्तर में घुस गया |

बाथरूम की ओर देखने की उसकी हिम्मत ही नहीं हो रही थी | हॉल की तरफ मुँह करके रली बिस्तर पर पड़ा रहा | उसने दरवाज़े को देखा | आधा खुला दरवाज़ा देख रवी के होश उड़ गये | "मैंने तो दरवाज़ा बंद किया था ! फिर यह कैसे खुल गया ! किसने खोला होगा !" यह खयाल मन में आते ही रवी के पेट में तितलियाँ उड़ने लगी | दिवार का सहारा लेते हुए रवी दरवाज़े के पास पहुँचा | उसने हॉल में झाँक कर देखा | बाहर अँधेरा ही अँधेरा था | घड़ी के टिक् टिक् की आवाज़ भी उस सन्नाटे में रवी को एक शोर की तरह लग रही थी | सब ठिक है यह सोच रवी बिस्तर की तरफ मुड़ा ही था और, "खळऽऽऽऽ..."

कांच के टूटने की आवाज़ से रवी जगह पर ही पुतला बन गया | आवाज़ किचन से आ रही थी | दिवार का सहारा लेते हुए थरथराते कदमों से रवी किचन की ओर बढ़ा | फैला हुआ अँधेरा, घड़ी की टिक् टिक्, सन्नाटा और कांच की आवाज़ इन सब की वजह से अब ड़र रवी के दिल और दिमाग़ पर हावी हो रहा था | रवी ने किचन के अँदर देखा तो कुछ नहीं था | "शायद मेरा वहम होगा |" यह सोचकर रवी पूछे मुड़ा बाथरूम में नज़र आनेवाली छबी अब उसके सामने खड़ी थी | उस छबी का ख़ून से सना एक हाथ रवी की ओर बढ़ रहा था | यह देख रवी पूरी तरह से ड़र गया | उसे चिल्लाना था पर मानों उसकी साँस अटक गयी थी | फटी आँख़ों से रवी देखता ही रह गया |

सुबह के पांच बज चुके थे | रवी की नींद खुली | रात की घटना अबतक उसके ज़हन में ताज़ी थी लेकिन सुबह होने की वजह से उसे थोड़ी हिम्मत आई | रवी बाहर आया | उसने देखा तो बाहर बहुत सारे लोग थे और ज़मीन पर एक कपड़ा फैला हुआ था | पुलीस भी वहाँ मौजूद थी | सामने कुर्सीपर रवी की पत्नी ज्योती बैठी रो रही थी | एक महिला काँस्टेबल रजिस्टर हाथ में लिए दूसरी कुर्सीपर बैठी थी | ज्योती बोल पड़ी, "क्या बताऊँ सर, मैं अपनी सहेलियों के साथ घूमने गयी थी | रात को बहुत लेट वापस आई | बेडरूम में आकर देखा तो टि.वी. आधा बंद था, सी.ड़ी. टेबलपर पड़ी थी और रवी बिस्तरपर लेटे करवँट बदल रहे थे | मैं बाथरूम होकर आई तो मेरे पीछे रवी भी आ गये | मुझे देख जब वह चौंक गये तो मैं तुरंत ही वहाँ से निकल पानी पीने किचन में आई | मेरे हाथ से कांच का ग्लास गिरकर टूट गया | कांच उठाते समय एक टुकड़ा हाथ को लगा और वह जख्मी हो गया | मेरे हाथ से निकलता ख़ून धोनेही वाली थी के पीछे से रवी अँदर आ गये | मैं उनके पास गयी आयऔर मुझे देख रली इतने ड़र गये के... मैंने इन्हें कितनी बार समझाया सर, के रात को भूत-वूत के मूवीज़ ना देखा करें | कल रात भी ऐसी ही मूवी देखी और..."

ज्योती सिसकसिककर रोनी लगी | लेडी काँस्टेबल उसे धीरज बँधाते हुए बोली, "ज्योतीजी, संभालिए खुद को | ड़र, इंसान की सोच का सबसे बड़ा दुश्मन होता है | आपके पती भी उसी ड़र की वजह से..." रली अभी अभी सामने खड़ा सोच रहा था, "रात के सारे वाक्ये ज्योती को कैसे मालूम... वह तो यहाँ..." रवी यह सोच ही रहा था के ज़मीन पर कपड़ा हवा से उड़ा मौत की नींद सोया रवी ही रवी को दिखाई दिया...

समाप्त |

@ अनिकेत परशुराम आपटे.