रात अपनी गति से चल रही थी | गहरी नींद की चादर ओढ़े सारा जहान सो रहा था | अपने
बिस्तर पर भावना बेहेश पड़ी थी | बहुत से खयालों ने उसके
दिमाग को जकड़ रखा था | दयाल काका के शब्द, वह हवेली, आपने दोस्तों की हालत यह सब सोचते सोचते
अचानक उसे होश आया | भावना ने करवट बदली और उसी वक्त
दरवाजेपर दस्तक हुई | सन्नाटे को चीरती हुई वह आवाज़ जब भावना
के कानों तक पहुँची तब हड़बड़ाकर वह उठी | बिस्तरपर बैठे
बैठे भावना ने दरवाजे की तरफ देखा | दरवाजे के नीचे उसे
रौशनी और एक साया नज़र आया | भावना ड़र गई | बिस्तर से उतरकर धीरे-धीरे वह दरवाजे की ओर बढ़ी | भावना
ने दरवाजे पर अपना कान रखा लेकिन कोई आवाज़ नहीं आ रही थी | भावना,
"शायद कोई मज़ाक कर रहा होगा..|" यह
सोचकर पीछे मुड़ी और वापस जाने लगी | तभी अचानक फिरसे दरवाजे
पर दस्तक हुई | इस बार आवाज़ ज़्यादा जोर से आ रही थी,
मानो गुस्से में कोई दरवाजा पीट रहा हो | भावना
तुरंत पीछे मुड़ी | उसने दरवाजे के नीचे देखा तो ना वह रौशनी
थी ना वह साया था | यह देखकर भावना और ड़र गई | ए.सी. चल रहा था फिर भी भावना ड़र के मारे पसीने में लथपथ हो गई थी |
थरथराते हाथों से उसने हँडल को पकड़ा और दूसरे ही पल एक झटके में
दरवाजा खोला | "आऽऽऽऽऽऽऽऽ..." भावना की चीख खामोशी
को चीरती हुई सब तरफ फैल गई...
कुछ घंटों पहले...
"एक दो तीन... चार पाँच छह सात आँठ नौ... दस ग्यारह... र आया भावना,
र..|" ड्रायव्हर की बगलवाली सीटपर बैठे
हुए टोनी ने गाना गुनगुनाते हुए कहा | भावना ने कुछ सोचा और
गाने लगी, "राजा की आयेगी बारात... रंगीली होगी
रात..." "भावना कौन है वह जिसका खयाल आ रहा है तुझे..|" भावना को बींच में ही टोकते हुए मंजू बोल पड़ी | मंजू
और बाकी सब की तरफ देख इशारा करते हुए भावना बोली, "देखो,
अगर ऐसे ही सताओगे मुझे तो चली जाऊँगी हां..|" "क्या यार भावना, मज़ाक भी समझ नहीं आता
तुझे..." भावना की ओर देखते हुए ड्रायव्हर की सीटपर बैठे रतन ने कहा |
फिर सामने देखकर सबको बोला, "लो, आ गये हम मेरे फार्म हाऊसपर..|" सबने सामने
देखा तो गाड़ी की रौशनी में एक बंगला नज़र आ रहा था | गाड़ी
गेट के अँदर गयी | सीढ़ियोंपर एक बूढ़ा आदमी बैठा था |
गाड़ी को देखकर वह खड़ा हो गया | गाड़ी से
उतरते हुए रतन ने पूछा, "कैसे हो दयाल काका..|"
मुस्कुराकर दयाल काका बोले, "बस कृपा है
बेटा... मालिक ने फोन किया था कि तुम अपने दोस्तों के साथ आ रहे हो... तुम सब के
खाने-पीने का और रहने का इंतज़ाम हो चुका है... अब थोड़ी देर यहाँ बरामदे में बैठो,
बिजली आते ही खाना लगा देता हूँ..|" सब
गाड़ी से उतर ही रहे थे कि टोनी की नज़र बंगले के दाँई ओर के जंगल में गई |
"गाइज़... वह देखो क्या है…"
सब ने टोनी की दिखाई जगह की ओर देखा तो एक ऊँची
काली इमारत नज़र आ रही थी |
"वाव...", "जंगल के बींच में
क्या है वह..." ऐसे शब्द तीनों के मुह से निकले | दयाल
काका ने जब उस तरफ देखा तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गई | "रतन बेटा, अपने दोस्तों को लेकर जल्दी अंदर चलो |
यहाँ रुकना ठीक नहीं | चलो बेटा..|"
यह कहते हुए दयाल काका की आँखों में ख़ौफ़ दिख रहा था | चारों कुछ न कहते हुए दयाल काका के पीछे अंदर चले गये | दरवाजा बंद करते समय टोनी ने एक बार उस इमारत की तरफ देखा और किवाड़ बंद
कर दिया | थोड़ी देर आराम करने के बाद दयाल काका ने सबको
खाने के लिए बुलाया | खाना चल ही रहा था कि टोनी ने अपना मुह
खोला, "काका, जंगल में वह क्या
था... और आप इतना घबरा क्यौं गये..!" "हां काका, बस
एक बिल्डिंग ही तो है... उससे इतना क्यौं ड़रना..!" रतन ने भी टोनी के पीछे
सवाल उठाया | हाथ का
बर्तन टेबलपर रखते हुए दयाल काका बोले, "सिर्फ़ एक
इमारत नहीं है वह, एक ख़ौफ़नाक भूत बंगला है…
'भूत बंगला' यह शब्द सुनकर भावना और मंजू सहम गये |
दयाल काका ने कहा, "हाँ, भूत बंगला | बहुत समय पहले यह एक चित्रकार की हवेली
थी | एक रोज़ तस्वीर बनाते बनाते वह चित्रकार मर गया |
उस दिन से उस हवेली में जानेवाला कोई भी वापस नहीं लौटा | इसीलिए कहता हूँ बच्चों उस हवेली का खयाल भी मन में मत लाना..|
" दयाल काका की बात सुनकर रतन बोल पड़ा, "दयाल काका, फिज़ूल की बातें करके हमें ड़रा रहे हो
क्या..|" "और नहीं तो क्या... भूत-वूत कुछ नहीं
होता, समझे | देखो तो, यह ड़रपोक लड़कियाँ कैसे ड़र गयी..|" रतन की
हां में हां मिलाते हुए टोनी ने जवाब दिया | हँसीं-मज़ाक चल
रहा था तभी टोनी ने रतन की ओर देखा तो रतन ने सिर हिलाया | थोड़ी
देर बातें करके सब सोने चले गये | कुछ देर बाद टोनी ने रतन
को जगाया | रतन तैयार ही था | दोनों
चुपके से बाहर आये | गेट पर पहुँचे ही थे कि किसी ने उनके
काँधे पर हाथ रखा | दोनों ने पीछे देखा तो मंजू और भावना
वहाँ खड़ी थीं | भावना बोली, "बड़ा
मज़ा आ रहा था ना हमें ड़रपोक कहते हुए | अब हम भी दिखाएँगी
कि हम तुम दोनों से कम नहीं..|" भावना की बात काटते हुए
मंजू ने कहा, "हाँ, इसलिए हम
दोनों भी चलेंगी तुम दोनों के साथ |" यह बात सुनकर टोनी
और रतन खुश हो गये | एक दूसरे को तालियाँ देते हुए सब उस भूत
बंगले के गेटपर पहुँचे…
चारों लोहे के एक बड़े से बंद गेट के सामने पहुँचे | गेटपर ताला लगा हुआ
था लेकिन कड़ी टूटी हुई थी | सब ने एक-दूसरे की ओर देखा |
टोनी और रतन ने दोनों हाथों से गेट को धकेला | बिना आवाज किये गेट खुल गया | मंजू और भावना ने
एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया तो टोनी बोला, "क्यौं,
ड़र गयी आप दोनों | अभी भी वापस चली जाओ |
डरपोक होना कोई बड़ी बात नहीं है, क्यौं रतन..|"
टोनी को ताली देते रतन ने कहा, "हाँ
बिलकुल, सही बात है |" दोनों
लड़कियों ने ड़र को दूर करते हुए कहा, "न...नहीं,
हम चलेंगी |" चारों अँदर आ गये | सामने कालीसी हवेली खड़ी थी | हवेली की दो खिड़कियाँ
और बंद दरवाज़ा ऐसे लग रहे थे जैसे कोई खोपड़ी सामने रखी हो | एक अजीब सी ठंड़ वहाँ फैली हुई थी | सब धीरे धीरे
आगे बढ़ रहे थे | भावना सबसे पीछे चल रही थी | यकायक उसका पैर फिसला और वह गिर पड़ी | उसके हाथ से
टॉर्च छूट गया और उसके प्रकाश में भावना को कुछ नज़र आया | भावना
ने उस चीज़ को उठाया तो वह एक लॉकेट था | भावना ने वह लॉकेट
उठाया और उसी वक्त मंजू ने उसके काँधेपर हाथ रखा | भावना
चिल्लाई और घबराकर खड़ी हो गयी…
उसकी आवाज़ सुनकर टोनी और रतन दौड़े चले आये |
भावना उसे मिले हुए लॉकेट के बारे में बता ही रही थी के हवेली का
बड़ा सा दरवाजा खुल गया | सब उस तरफ देखने लगे | कोई शक्ती मानों चारों को अँदर बुला रही थी | चारों
अँदर पहुँच गये | वहाँ रौशनी का नामोनिशान नहीं था | नीचे दो-तीन दरवाज़े थे और एक सीढ़ी ऊपरी मंज़िलपर जा रही थी | अँधेरा और सन्नाटे के अलावा वहाँ कुछ नहीं था | चारों
टॉर्च थामें आगे बढ़ रहे थे | एक दिवार पर लटकी हुई कुछ
तस्वीरोंने उनका ध्यान खींच लिया | पुरानी फोटो फ्रेमें और
तस्वीरें नई, यह देखकर सब अचंभित हुए | सब उन तस्वीरों को
देख ही रहे थे, कि, "टन... टन...
टन... टन..." इस आवाज़ से सब चौंक गये | रतन अपनी घड़ी
देख बोला, "अभी तो साढ़े बारह बजे हैं और यह घंटों की
आवाज़ चार बार आयी | मंजू बोली, "आवाज़
तो काफी पुरानी लगती है | शायद घड़ी ख़राब होगी |"
"पर, यह आवाज़ आ कहाँ से रही है |
घड़ी तो कहीं नज़र नहीं आ रही |" मंजू की
बात काटते हुए भावना बोल पड़ी | भावना की बात सुनकर सब सोच
में पड़ गये | टोनी ने कहा, "हम
सब अलग अलग होकर घड़ी को ढूँढ़ते हैं, तुम दोनों नीचे देखो |
भावना और मैं ऊपर जाते हैं |" चारों दो
हिस्सों में बट गये | भावना और टोनी ऊपर जाने लगे तो रतन और
मंजू नीचेवाले कमरों की ओर बढ़े…
भावना और टोनी ऊपर के बरामदे में पहुँचे | टॉर्च जलाकर बंद कमरों की ओर देख ही रहे थे, कि भावना
किसी चीज़ से टकराई और टॉर्च उसके हाथों से छूट गया | भावना
ने टॉर्च उठाया और सामने देखा तो टोनी गायब था | भावना टोनी
को ढुँढ़ने लगी तो एक कमरे के दरवाज़े के नीचे उसने रौशनी देखी | कमरे के पास पहुँचकर भावना ने दरवाजा धकेला | रौशनी
कमरे की बाँई ओर से आ रही थी | भावना वहँ गयी तो ज़मीनपर
टोनी का टॉर्च पड़ा था | भावना ने टॉर्च उठाते हुए सामने
देखा और, "आऽऽऽऽऽऽ..." भावना की चीख सुनकर रतन और
मंजू दौड़ते हुए ऊपर आये | काँपते हाथों से भावना ने एक जगह
दिखाया तो वहाँ टोनी मरा हुआ दिखाई दिया | उसकी दोनों आँख़ें
इस कदर खुली थी मानों मरने से पहले टोनी ने कोई डरावनी चीज़ देखी हो | तीनों लाश के पास ही खड़े थे के, "टन... टन...
टन..." घंटों की आवाज़ सुनकर तीनों चौंक पड़े | सब तरफ
देखते हुए मंजू ने कहा, "तीन घंटों की आवाज़... ह...म
आए थे तब चार घंटों की आवाज़ थी | टोनी मर गया और अ...ब
त...तीन घंटों की आवाज़..|" रतन ने भावना की तरफ मुड़ते
हुए पूछा, "भावना, तुम दोनों ऊपर
आए तब किसी और को देखा यहाँ..??"
सर हिलाते हुए भावना ने कहा, "नहीं यार, यहाँ और कोई नहीं था | टॉर्च उठाने मैं झुकी और पलक झपकते ही टोनी गायब हो गया |" रतन के माथे से पसीना टपका | वह बोला, "यहाँ ज़रूर कुछ गड़बड़ है | यहाँ से जल्दी निकल जाते
हैं, चलो | तीनों बरामदे में पहुँचे ही
थे कि रतन ने कहा, "ठहरो, अपनी
गाड़ी की चाबी टोनी के पास थी | तुम दोनों नीचे चलो, मैं चाबी लेकर आता हूँ |" इतना कहकर रतन वापस
मुड़ा | मंजू और भावना सीढ़ियों से नीचे उतरी और उनकी नजर
तस्वीरों की तरफ गयी | उन तस्वीरों के बीच अब टोनी की तस्वीर
देखकर भावना और मंजू घबरा गई | वह दोनों तस्वीरों के सामने खड़ी
ही थी कि, "आऽऽऽऽऽ..." रतन कि आवाज़ सुनकर
उन्होंने ऊपर देखा | रतन को किसी ने ऊपर से धक्का दिया हो इस
तरह वह नीचे आया और ज़मीन पर खड़े काँच के टेबल पर जा गिरा | मंजू और भावना तुरंत रतन के पास आयीं | रतन की मौत
हो चुकी थी | टोनी की ही तरह फटीं आँखें और बाहर निकलती
ज़ुबान देख दोनों की चीख निकल गई | दोनों ने तस्वीरों की ओर
देखा और बाकी तस्वीरों के साथ रतन की तस्वीर देखकर भावना बोली, "म...मंजू, अ...ब तो रतन भी... ह...म दोनों ही बची
हैं...क...क्या हो रहा है यह..." भावना की बात काटते हुए मंजू ने कहा,
"यहाँ ज़रूर कुछ ऐसा है जो नहीं चाहता कि हम ज़िंदा रहें |
हमें यहाँ आना ही नहीं चाहिए था | चलो भाग
चलें |" दोनों खड़ी ही हो गयीं थीं कि, "टन... टन..."
घंटों की आवाज़ सुनकर दोनों ड़र गई | एक-दूसरे का हाथ पकड़कर दोनों एक-दूसरे की ओर देखने लगी और भावना के हाथ
से लॉकेट छूटकर ज़मीनपर गिर गया | लॉकेट उठाकर भावना ने
सामने देखा तो मंजू वहाँ नहीं थी | "मंजू... मंजू...
कहाँ हो..." ऐसे चिल्लाकर भावना मंजू को ढुंढ़ने लगी | सीढ़ियोंपर
भावना ने मंजू को देखा | उसकी फटी फटी आँखें और बाहर निकलती
ज़ुबान देखकर भावना काँप उठी | उसने धीरे-धीरे तस्वीरों की
ओर देखा तो मंजू की तस्वीर को वहाँ लटका पाया | मंजू की
तस्वीर को देखकर भावना सहम गयी | पीछे-पीछे हट रही थी कि,
"टन..." घंटे की आवाज़ सुनकर वहीं पुतला बनकर खड़ी हो गई |
"सिर्फ तुम ही बची हो भावना... अब तुम्हारी भी तस्वीर बनेगी |"
सन्नाटे को काटती हुई यह आवाज़ भावना के कानों तक पहुँची तो वह और
ड़र गई | भावना ने मुड़कर देखा तो वहाँ कोई नहीं था |
वहाँ के हर दरवाजे और खिड़की को पीटती हुई, "बचाव... कोई है... मुझे यहाँ से बाहर निकालो..." ऐसे चिल्लाते हुई
भावना भाग रही थी | भागते हुए भावना को ठोकर लगी तो वह
लड़खड़ाई | तभी उसकी नज़र उसके हाथ में पड़े लॉकेटपर गई |
लॉकेट चमक रहा था | थरथराते हाथों
से भावना ने लॉकेट उठाया और उसी वक्त उसके बाँई ओर की खिड़की खुल गई | एक पल और ना गवाँते हुए भावना खिड़की की तरफ भागी और खिड़की से कूदकर
हवेली के बाहर आ गई | पीछे मुड़कर भी ना देखते हुए भावना
भागी जा रही थी | उसने गेट को पार किया और जंगल में पहुँच गई
| हवेली की ऊपर की दोनों खिड़कियों में और नीचे के दरवाजे
में लाल रौशनी दिखाई देने लगी | मानो वह हवेली भावना के
ज़िंदा बाहर जाने ती वजह से आग बबुला हो रही थी | भावना ने
यह देखा मात्र और फिरसे भाग ने लगी | अँधेरे में पत्थरोंपर
लड़खड़ाने का, काँटों के चुभने का भावना को कुछ खयाल नहीं था
| वह बस भागी चली जा रही थी | थोड़ी ही
देर में वह कॉटेज पहुँच गई | ज़ोर-ज़ोर से दरवाजा पीटते हुए,
"खोलो जल्दी... द...याल काका... जल्दी खोलो दरवाज़ा..."
यह चिल्लाने लगी | दयाल काका ने कॉटेज का दरवाजा खोला तो
तुरंत ही भावना अँदर आ गई और सारे दरवाजे एवं खिड़कियाँ बंद करने लगी |
"क्या हुआ बेटी... अरे कुछ बोलो भी..." दयाल काका ते इन
सवालों का भावना जवाब देना चाहती थी लेकिन घबराहट के मारे वह कुछ बोल ही नहीं पाई |
उसने लॉकेट दयाल काका को दिखाया | लॉकेट काला
पड़ गया था | यह देखकर भावना की आँखे ड़र के मारे और बड़ी हो
गईं और वह बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ी |
अभी के समय में...
कॅमेरे के फ्लॅश चमक रहे थे | एक कोने में दयाल काका सिर झुकाए खड़े थे | पुलीस
कमरे को बारिकी से देख रही थी | इंस्पेक्टर साहब ने दयाल
काका को आगे बुलाते हुए पूछा, "तुम ने फोन किया ना
हमें... यह कैसे हुआ बता सकते हो..?" दयाल काका एक बार
दरवाजे की ओर देखते हुए बोले, "साहब, इसका नाम भावना था | हमारे रतन बाबा, मतलब मालिक के बेटे की यह दोस्त थी | रतन बाबा इस
लड़की और अपने दो दोस्तों के साथ शाम को आए थे | खाना खाने
के बाद करीब दस बजे सब सोने चले गए | मैं भी काम खत्म करके
सोने चला गया | अभी कुछ देर पहले दरवाजे की आवाज़ से मेरी
नींद खुली | मैंने देखा बिटिया घबराई हुई अंदर आ गई और आते
ही बेहोश हो गई | उसे पलंगपर लिटाकर रतन बाबा को बुलाने गया
और बिटिया की चीख़ सुनकर वापस दौड़ा आया | देखा तो
यह..." दयाल काका, इंस्पेक्टर और बाकी के पुलीसवालों ने
दरवाज़े की ओर देखा | भावना वहाँ मरी पड़ी थी | उसकी आँखें बाहर निकल आईं थी और उसकी गर्दन पूरी तरह मरोड़कर चेहेरा पीछे
की ओर मुड़ा हुआ था |
लाश को देखकर एक हवलदार बोला, "सर, जिस तरह से इस लड़की को मारा गया है, यह किसी इंसान का काम नहीं लगता |" इंस्पेक्टर
साहब का सवालभरा चेहेरा देख वह हवलदार ने कहा, "सर,
इस इलाक़े में रात के समय कई लोग गायब हुए हैं और सुबह उनकी लाशें जंगल
में मिलीं हैं | दो साल पहले याद है ना सर... पाँच लाशें
एकसाथ मिली थीं उस हवेली के पीछे..." हवलदार की बात को काटते हुए दयाल काका
ने कहा, "हवलदार साहब, आपने हवेली
कहा... इंस्पेक्टर साहब, मैंने इन बच्चों के सामने उस भूतिया
हवेली का जिक्र किया था | हे भगवान, मतलब
यह बच्चे भी वहीं तो नहीं गये..." दोनों की बात सुनकर इंस्पेक्टर साहब ने कहा,
"जो कुछ भी हो, मैं भूत-वूत, आत्मा-वात्मा नहीं मानता | फिलहाल इस लड़की की लाश
को पोस्ट मॉर्टम ते लिए भेज दो और इसके घरवालों को खबर कर दो | ज़्यादा फोर्स बुलाकर जंगल को छान मारो ताकी बाकी तीनों का पता चल
सके..."
चारों के समान की तलाशी लेकर चारों के घर ख़बर कर
दी गई |
सारी तहकीकात करने के बाद मंजू, रतन और टोनी
को ढूँढ़ने के लिए कुछ हवलदारों को जंगल की ओर भेजकर इंस्पेक्टर साहब चौकी की ओर
रवाना हो गये | चौकी में भावना की पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट उनका
इंतज़ार कर रही थी | इंस्पेकटर ने रिपोर्ट पढ़ी | मौत की वजह लिखी थी, "गर्दन का मरोड़ना और साँस
की नली का बंद होना |" हवलदार को इशारा करते हुए
इंस्पेक्टर ने कहा, "अब तक जंगलवाले इलाक़े में जो भी
मौतें हुईं हैं उनकी फाईल लाना |" बहुत देर तक
इंस्पेक्टर फाईल देख रहे थे | तभी फोन की घंटी बजी | फोन सुनने के बाद खड़े होते हुए इंस्पेक्टर ने कहा, "क्या... ठिक है | उनकी लाशों को पोस्ट मोर्टम ते लिए
भेज दो और तुम सब यहाँ चले आओ |" फिर अपने साथियों की
तरफ मुड़ते हुए बोले, "साथियों, जंगलवाले
हादसों की फाईल देख रहा था | सभी मौतों की वजह है Cardiac
arrest | मतलब दिल की धड़कन अचानक रुक जाने कि वजह से मौत | लेकिन..." इंस्पेक्टर बोल ही रहे थे कि बाहर शोर सुनाई देने लगा |
इंस्पेक्टर साहब बाहर आए तो देखा कि उन बच्चों के
परिवारवाले वहाँ आए हुए थे | इंस्पेक्टर साहब सबको शांत करते
हुए बोले, "देखिये, सब शांत हो
जाइये... कल सिर्फ एक लड़की की मौत हुई थी लेकिन बडे़ दुख के साथ कहना पड़ रहा है
कि अभी अभी बाकी तीनों की लाशें भी जंगल से बरामद हुईं हैं |" यह सुनकर सब रोने लगे | इंस्पेक्टर साहब आगे बोले,
"धीरज रखिये | उन चार बच्चों में से
भावना नाम की लड़की की लाश कॉटेज में मिली है और बाकी तीनों की बॉडीज जंगल में
मिलीं हैं | इस लड़की भावना का ख़ून हुआ है यह तो साफ है,
लेकिन उन तीन बच्चों का क्या हुआ यह तो पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट आने के
बाद ही पता चलेगा | सारी बॉडीज आपको तभी मिल पाएँगी |"
यह सुनकर वहाँ आए सब लोग भिगी आँखें लेकर चौकी से निकल गये |
तभी बाकी तीन बच्चों की पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट लेकर एक हवलदार आया |
इंस्पेक्टर साहब ने रिपोर्ट पढ़ी और उनकी आँखें बड़ी हो गई |
उन्होंने उस हवलदार को पूछा, "कहाँ मिली
इन तीनों की लाशें..." हवलदार बोल पड़ा, "सर,
हम उन तीन बच्चों की तलाश करने जंगल में गए | जंगल
के बीचों बीच एक जगह तीन नये पेड़ लगे दिख रहे थे |
हमें शक़ हुआ | वहाँ खोदकर देखा तो
तीन लाशें वहाँ गढ़ी हुईं थीं | सर, अबतक
उस इलाक़े में कई मौतें हो चुकीं हैं | मेरा तो कहना है अभी
भी वक्त है | जंगलवाले इलाके को चारों ओर से सील कर दें तो |"
हवलदार की बात सुनकर इंस्पेक्टर साहब बोले, "तुम ठिक कहते हो | और जानें न जाएँ इसलिए वहाँ
नाकाबंदी लगाना जरूरी है | लेकिन एक बात मेरे समझ के बाहर है
| आजतक जितनी भी मौतें हुईं हैं, वह सब
दिल के दौरे की वजह से हुईं हैं, और सबकी लाशें गायब हैं |
हमारे पास जितने गुमशुदा लोगों की रिपोर्ट आयी, उन सबकी लाशें जंगल में मिली | पर, इस लड़की भावना की लाश जंगल से बाहर कॉटेज में मिली | बड़ी बेरहमी से उसका खून किया गया था | ऐसा
क्यौं..." "यही बात मैं भी जानना चाहता हूँ |" इंस्पेक्टर साहब बोल ही रहे थे के इस आवाज़ से सब का ध्यान बट गया |
सब ने आवाज़ की तरफ देखा तो दरवाजे में एक आदमी
खड़ा था |
सबका ध्यान अपनी तरफ है यह देख वह बोला, "सर, मैं भावना का बड़ा भाई शेखर हूँ | भावना की मौत उसके तीनों दोस्तों से अलग क्यौं है यह जानने की कोशिश कर
रहा हूँ |" इंस्पेक्टर साहब ने शेखर को अंदर बुलाया |
अंदर आते हुए शेखर बोला, "सर, बचपन में ही हमारे माता-पिता गुजर गए | तब से हम
दोनों ही थे एक-दूसरे के लिए | अब भावना भी नहीं रही |
मैं अकेला हो गया | जिस किसीने यह किया है,
उसे सज़ा मिलनी ही चाहिये सर |" शेखर को
शांत करते हुए इंस्पेक्टर साहब बोले, "शांत हो जाइये |
हम ख़ूनी को जल्द से जल्द पकड़ने की पूरी कोशिश करेंगे |"
"ख़ूनी कोई इंसान हो तो पकड़ेंगे ना..." यह आवाज़ सुनकर
सब उस तरफ देखने लगे | कुर्सीपर एक बुज़ूर्ग बैठे थे |
अपनी तरफ सबका ध्यान है यह देख वह बोले, "माफ किजिये मैं बींच में बोल रहा हूँ | मैं अपनी
साइकिल खो जाने की शिकायत दर्ज करने आया था | उस जंगल की
बातें सुनकर रहा न गया इसलिए बोल रहा हूँ...
इस जगह मेरा बचपन गुज़रा है | यहाँ हुई सारी घटनाओं से मैं परिचित हूँ | उस जंगल
के बारे में बहुत पुरानी कहानी मेरी माँ मुझे सुनाती थी | बहुत
साल पहले यहाँ जंगल नहीं बल्कि गाँव बसता था | गाँव के बींचो
बींच गाँव के ज़मीनदार की हवेली थी | ज़मीनदार का बेटा सोहन एक
बिमारी से ग्रस्त था | सूरज की रौशनी से उसका शरीर जलने लगता
था और फोड़े भी आते थे | इसीलिये सोहन कभी हवेली से बाहर नहीं जाता था |
लेकीन वह एक बहुत अच्छा चित्रकार था | लोगों के चित्र बनाकर
हवेली की दिवारों पर उन्हें टाँग देता था | चित्र बनाने के
लिए ज़मीनदार के नौकर आस-पास से आदमियों को या औरतों को पकड़ पकड़कर लाते थे |
लंबी बिमारी के चलते ज़मीनदार गुज़र गया, लेकिन
सोहन का शौक वैसेही चलता रहा | हवेली के तहखाने में सोहन
चित्र बनाने में घंटों लगा देता और चित्र पूरा होते ही सोहन तहखाने में ही खड़ी एक
बड़ीसी घड़ी का घंटा बजा देता था | जितने लोग चित्र के लिए
लाए जाते उतने घंटे सोहन बजाता | हवेली के नौकर घंटे की आवाज
सुनकर तहखाने से उस इन्सान को ऊपर लाते और बाहर छोड़ देते | यह
सिलसिला यूँही चलता रहा | फिर एक दिन वही हुआ जिसका ड़र था |
एक दिन तस्वीर बनाने के लिए लाया गया स्कूल का एक बच्चा ड़र के मारे रोने
लगा | उसे चुप कराने के लिए
सोहन ने उसे चांटा मारा | बच्चा गिर पड़ा और उसी वक्त मर गया
| सोहन ने बच्चे को कुर्सीपर बिठाया | तस्वीर
बनाते वक्त उसे खयाल ही नहीं आया कि बच्चा मर चुका है | तस्वीर
खत्म होते ही सोहन ने घंटा बजाया | जब सोहन बच्चे के पास गया
तब उसे बच्चे की मौत का पता चला | यह देखकर सोहन के होश उड़
गये | सोहन ने उसी वक्त बच्चे को ले जाकर हवेली के पीछे गाड़
दिया और ऊपर पौधा लगा दिया | घंटे की आवाज सुनकर आये एक नौकर
शंभू ने यह सब देख लिया | तब सोहन ने उसे बहुत सारे पैसों का
लालच दिया | शंभू चूप हो गया | कुछ दिन
बीत गये | जब बच्चे की मौत की कोई खबर बाहर से नहीं आयी तो
सोहन को यकीन हो गया कि बच्चे की मौत छुप गई है | उस दिन से
सोहनपर एक जुनून सवाँर हुआ | नौकर जिस किसी को पकड़कर लाते,
सोहन उसे मार देता | फिर उसकी तस्वीर बनाता |
घंटा बंजते ही शंभू उस इंसान की लाश को ले जाकर हवेली के पीछे दफना
देता और ऊपर पौधा लगा देता | सोहन के कारन लोगों की जान जा
रही है... यह बात शंभू को खाए जा रही थी | पर पैसों का लालच
उसके आड़े आ जाता |
एक शाम एक लड़की हवेली से निकल भागी | गाँव की ओर भागती उस लड़की को सोहन ने रास्ते में ही धर
लिया | पास की झाड़ी में ले जाकर उसके साथ.......... | फिर गला घोटकर उसे मार डाला | पास ही खेलते एक
बच्चे ने यह सब देखा | उसे अंधेरे में किसी का चेहरा नजर
नहीं आया | उसने तुरंत ही गाँव जाकर सबको बताया | लड़की की मौत की खबर सुनकर गाँववाले आगबबूला हो उठे | मशालें, पत्थर और लाठियाँ लेकर सब हवेली पहुँचे |
सब फाटक के अंदर आये और हवेली को घेर लिया |
हवेली के पीछे कोई खोद रहा था और पास ही उस लड़की की लाश पड़ी
थी | यह देखनेवाले लोगों ने
बाकी सब को बुलाया | भीड़ को आता देख सोहन वहां से भागा और
तहखाने में छुप गया | गाँववाले दरवाजा पीटते रहे लेकिन सोहन ने
दरवाजा नहीं खोला | आखिर गाँववालों ने हवेली को आग लगा दी |
आग की लपटों में घिरी हवेली से यकायक घंटे की आवाज़ आयी | रात के समय जलती हुई हवेली से आई यह घंटे की आवाज़ मानो कह रही थी,
"मैं यहीं हूँ और यहीं रहूँगा |" घंटे
की आवाज़ सुनकर गाँववाले सहम गये | उन्होंने उसी वक्त हवेली
को तोड़ दिया | उस नौकर शंभू का क्या हुआ यह आज तक किसी को
पता नहीं चला | सोहन मर गया, लेकिन
लोगों के गायब होने का सिलसिला चलता रहा | धीरे धीरे बस्ती
कम होती गयी और जंगल बढ़ता गया | आज भी कुछ लोग कहते हैं कि
उन्होंने रात के समय जंगल में हवेली को देखा और मौत की दस्तक देती घंटे की आवाज़
भी सुनी है |"
वह
बूढ़ा आदमी चुप हो गया | इंस्पेक्टर साहब, हवलदार और शेखर
सहमे हुए एक-दूसरे की ओर देखने लगे | चुप्पी तोड़ इंस्पेक्टर
साहब बोले, "यह सब कही-सुनी बातें हैं | मेरा इनपर बिलकूल विश्वास नहीं है | कानून सबूत
माँगता है | फिलहाल तो मि. शेखर, आप
भावना के इस समान को एक बार..." इंस्पेक्टर बोल ही रहा था कि शेखर की नज़र
भावना के समान में रखे लॉकेट पर पड़ी | इंस्पेक्टर को बीच
में तोड़ते हुए शेखर बोला, "सर, आप
माने या ना माने पर अब इन बातोंपर मुझे विश्वास आ रहा है | यह
देखिये सर, भावना के समान में रखा यह लॉकेट उसका है ही नहीं |
वह कभी भी कोई लॉकेट नहीं पहनती थी |" शेखर
की बात को आगे बढ़ाते एक हवलदार ने कहा, "लेकिन सर,
कॉटेज के चौकीदार ने कहा कि जब भावना वापस आयी तब उसके हाथ में यह
लॉकेट था और तहकीकात के दौरान यही लॉकेट हमें ज़मीन पर पड़ा मिला था |"
शेखर फिरसे बोल पड़ा, "सर, आप ही के कहे मुताबिक इस इलाके में हुई मौतें दिल की धड़कन रुकने की वजह
से हुईं हैं और लाशें जंगल में मिलीं हैं | लेकिन भावना का
ख़ून किया गया और लाश भी कॉटेज में मिली, जंगल के बाहर |
क्यौं सर, भावना के नसीब में यह दर्दनाक मौत
क्यौं ? यह जानने के लिए हमें उस हवेली को ढ़ूँढ़ना होगा | हो सकता है यह लॉकेट भी उस हवेली का ही अंश हो..."
अगला भाग कुछ ही दिनोंमें...
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