Saturday, January 18, 2020

जुनून - दूसरा और अंतिम भाग...

पहले भाग में...

भावना, रतन, मंजू और टोनी भूतिया हवेली में फंस जाते हैं | बाकी तीनों की मौत हो जाती है लेकिन एक लॉकेट की वजह से भावना वहाँ से ज़िंदा बाहर आती है | पर कुछ ही घंटों में वह भी मर जाती है | भावना का भाई शेखर जब भावना की मौत के बारे में और जानने की कोशिश करता है तो पुलीस थाने में मौजूद एक बुजूर्ग सबको सोहन की कहानी सुनाता है कि कैसे तस्वीर बनाने के जुनून में सोहन ने बहुत सारी जाने लीं हैं | तब इंस्पेक्टर, शेखर और दो हवलदार उस हवेली को ढूँढ़ने जंगल की ओर बढ़ते हैं |

दूसरा और अंतिम भाग...

शेखर की बातें सुनकर इंस्पेक्टर सोच में पड़ गया | शेखर की ओर मुड़ते हुए वह बोला, "आपकी बातें काफी हद तक सही हैं मि. शेखर | भावना की मौत बाकी सब मौतों से अलग है | यह लॉकेट अगर उन चारों बच्चों का नहीं है तो हो सकता है हवेली में से ही आया हो | भावना अकेली लड़की थी जो जंगल से ज़िंदा बाहर आयी | हो सकता है उसे कोई रास्ता मिला हो | जो भी हो, हमें वहाँ अभी जाना होगा | लेकिन मि. शेखर, मैं आपकी जान खतरे में नहीं डाल सकता | आप यही रहिये हम..." इंस्पेक्टर को बीच में रोकते हुए शेखर बोला, "भावना का ख़ूनी वहाँ है और मैं हाथपर हथ धरे यहाँ बैठा रहूँ... नहीं सर, मैं भी आपके साथ आऊँगा |" इंस्पेक्टर शेखर की बात को टाल ना सके | सारी तैयारियाँ करने के बाद लॉकेट हाथ में लेकर इंस्पेक्टर साहब, कुछ हवलदार और शेखर जीप की ओर बढ़े | दोपहर शाम की तरफ ढल रही थी |

दोपहर ढलते ढलते जीप जंगल के करीब पहुँची. सबके उतरतेही इंस्पेक्टर साहब ने एक हवलदार से पूछा, "मोहिते, जिस जगह तुम्हे उन तीन बच्चों की लाशें मिलीं थी वहाँ हमें ले चलो |" मोहिते आगे बढ़ा और सब उसके पीछे चल पड़े | एक जगह आकर सब रुक गये | मोहिते ने तीन गढ्ढ़ों की तरफ इशारा करते हुए कहा, "सर, यहीं से हमने उन तीनों की लाशों को बरामद किया था |" इंस्पेक्टर उन गढ्ढ़ों की ओर देखते हुए बोले, "वेल डन मोहिते | सब लोग सुनो, चौंकी में उस बुड्ढे ने कहा था कि शंभू लाशों को हवेली के पीछे गाड़ देता था | मतलब अगर सचमें ऐसा कुछ है तो हम हवेली के पीछे खड़े हैं | यहीं से हवेली के अंदर उस तहखाने तक जाने का रास्ता मिल सकता है | ढूँढ़ों, लेकिन चौकन्ने रहना | मि. शेखर, आप हमारे साथ ही रहें |" सब यहाँ वहाँ देखने लगे | यकायक इंस्पेक्टर का पैर फिसला और वह गिर पड़ा | लॉकेट उसके हाथों से छूटा और थोड़ी दूर जा गिरा | हवलदार इंस्पेक्टर को खड़े होने में मदद कर ही रहे थे कि तभी शेखर की नज़र लॉकेटपर पड़ी | लॉकेट चमक रहा था | "इंस्पेक्टर साहब, वह देखिये |" शेखर की आवाज़ सुनकर सबने लॉकेट की तरफ देखा | "अब तक काला पड़ा हुआ यह लॉकेट तो चमक रहा है | जरूर यहीं से तहखाने का रास्ता होगा |" यह कहकर शेखर जल्दी-जल्दी मिट्टी हटाने लगा | इंस्पेक्टर और हवलदार भी उसकी मदद करने पहुँचे | देखते ही देखते वहाँ एक गड्ढ़ा नज़र आने लगा | इंस्पेक्टर ने टॉर्च मारा, तो नीचे जाती सीढ़ियाँ दिख रही थी |

सब धीरे-धीरे नीचे उतर आये | वह एक छोटासा कमरा था | सब तरफ मकड़ी के जाले थे | कीड़े यहाँ से वहाँ रेंग रहे थे | एक तरफ दीमक से खोकली हुई एक लकड़ी की घंटेवाली घड़ी थी | इंस्पेक्टर ने कहा, "लगता है बहुत सालों से यह कमरा ज़मीन के नीचे दफ़न था | यहाँ क्या मिलेगा हमें | वापस चलो सब |" इंस्पेक्टर को रोकते हुए शेखर ने कहा, "रुक जाइये सर, यहाँ जरूर कुछा ना कुछ होगा | नहीं तो यह लॉकेट हमें यहाँ क्यों लाता..." शेखर बोल ही रहा था के लॉकेट चमकने लगा | इस बार लॉकेट की चमक अधिक थी | लॉकेट से किरणों का एक समुंदर निकला और सबको छूता हुआ सीढ़ियों की उलटी दिशा में गायब हो गया | उस तेज रौशनी से सबकी आँखें चौंधिया गयी | सब ने धिरेसे आँखें खोली तो सब एक कमरे में थे | घड़ी पूरी तरह से ठिक थी लेकिन बंद थी | कमरा ऐसे लग रहा था मानो अभी भी उसका इस्तमाल होता हो | एक कुर्सीपर एक बच्चा बैठा रो रहा था और उसके सामने एक आदमी कँव्हासपर उसकी तस्वीर उतार रहा था | उस आदमी के गले की ओर इशारा करते हुए शेखर ने उसके गले का लॉकेट दिखाया | यह वही लॉकेट था जो भावना के पास मिला था और इस वक्त इन्स्पेक्टर के हाथ में था | रोते हुए बच्चे को डाँटते हुए वह आदमी बोला, "ए छोकरे, अपनी टँ टँ बंद कर और हिलना मत, नहीं तो तस्वीर बिगड़ जाएगी |" आदमी तस्वीर बना ही रहा था के, "शंभू... अरे ओ शंभू... मेरी दवाइयाँ..." ऊपर से आती यह आवाज़ सुनकर चिड़ गया |

"यह सोहन भी ना... जरा देर रुक नहीं सकता | इस सड़ते हुए सोहन को सँभालते सँभालते कहीं मैं ही बीमार ना पड़ जाऊँ..." अपने आप से बुदबुदाता शंभू उठा और, "आया छोटे मालिक..." यह चिल्लाकर बाहर जाने लगा | जाते वक्त, "ए लड़के, अभी आता हूँ मैं, हिलना नहीं यहाँ से... समझे |" शंभू के बाहर जाते ही ड़रा हुआ वह बच्चा कुर्सी से नीचे उतरा और बाहर का रास्ता ढूँढ़ने लगा | तभी शंभू वापस आया | बच्चे को सामने खड़ा देख शंभू गुस्से से लाल हो गया | "कंबख्त, मेरी बात नहीं सुनता... यह ले |" यह कहकर शंभू ने बच्चे को थप्पड़ मार दिया | झटके के कारन बच्चा टेबल से टकराकर नीचे गिरा और वहीं ढ़ेर हो गया | बच्चे को मरा हुआ देख शंभू पहले तो ड़र गया लेकिन उसे किसीने नहीं देखा यह जानकर शंभू ने तुरंत बच्चे को कुर्सीपर बिठाया | अपनी तस्वीर पूरी कर शंभू ने बच्चे की लाश को उठाया और पीछे के रास्ते से हवेली से बाहर आया | गड्ढा खोदकर शंभू ने लाश को उसमें रख दिया | गड्ढा बुझाकर वह लौट ही रहा था कि, "जय अल्लख निरंजन..." यह आवाज़ सुनकर वह चौंक गया | शंभू ने पीछे देखा तो एक साधू खड़ा था | शंभू के पास आकर वह साधू बोला, "बच्चा, यह तेरी पहली बली है | और हज़ार इंसानों की बली चढ़ा दे कालदेव को... तू अमर हो जाएगा... जय अल्लख निरंजन..."

यह कहकर साधू चला गया | "और हज़ार बली दे दूँ तो मैं अमर हो जाऊँगा... बहुत अच्छा... लेकिन फिलहाल मुझे इस हत्या से बचना है |" यह सोचता हुआ शंभू हवेली पहुँचा | कुछ दिन बीत गये | शंभू अपने रोज़ के कामों में जुट गया | बच्चे की मौत की कोई खबर नहीं यह जानकर शंभू को सुकून आया | उसके सरपर जैसे कोई जुनून सँवार हो गया | एक कोने में खड़े इंस्पेक्टर साहब, शेखर और बाकी हवलदार यह सब देख रहे थे | यकायक घड़ी के काँटे तेज़ भाग ने लगे | एक के बाद एक दृश्य उन सबके सामने से गुज़रने लगे | सभी दृश्यों में शंभू किसी की जान लेता हुआ, फिर उसकी तस्वीर बनाता हुआ और लाश को हवेली के बाहर ले जाता हुआ नज़र आ रहा था | अचानक घड़ी के काँटे रुक गये | दृश्य फिरसे पहले की तरह धीरे-धीरे चलने लगे | "यह क्या कर रहे हो... छोड़ो मुझे..." इस आवाज़ से सब चौंक गये | सब ने देखा तो शंभू एक लड़की को खींचता हुआ तहखाने में ला रहा था | एक-दो थप्पड़ जड़ते ही लड़की ज़मीनपर गिरकर बेहोश हो गयी | बेहोश लड़की को देख शंभू के अंदर का जानवर जाग उठा | वह उस लड़की पर झपटा और तभी, "यह क्या कर रहे हो शंभू..."

इस आवाज़ से शंभू वहीं थम गया | उसने पीछे मुड़कर देखा तो सोहन वहाँ खड़ा था | सोहन को देख शंभू घबरा गया लेकिन खुद को सँभालते हुए बोला, "छोटे मालिक आप यहाँ... लगता है आपने दवाई नहीं ली | तभी होश में है इस वक्त | कभी ना कभी पता चलना ही था | चलो, आज ही पता चल गया | लेकिन सोहन बाबू, मैं कहाँ कुछ कर रहा हूँ | कर तो आप रहे हैं | आज ही नहीं, बहुत पहले से | तेरे पिता मेरी गरिबी पर तरस खाकर मुझे यहाँ ले आए | चित्रकारी के मेरे शौक को परखकर इस तहखाने में मेरे लिए जगह बनाई | यह काम तो उन्होंने ठिक किये, लेकिन साथ ही तेरे जैसे बीमार व्यक्ति को सँभालने की जिम्मेदारी भी दे दी | मेरा आधा वक्त तो तुझे दवाई देने में ही निकल जाता | ऊपर से जिस किसीसे मैं तस्वीर बनाने के लिए कहता वह मुझे झटक देता | तब मैंने दिमाग लगाया | ज़मीनदार के बेटे को याने तुझे तस्वीरें बनाने का शौक है यह बात मैंने सब जगह फैलाई | वह बूढ़ा तो उसके काम में लगा रहता था | तेरे कारन मुझे कोई परेशानी ना हो इसलिए मैंने तुझे दवाइयों के साथ बेहोशी की दवा भी पिलाना शुरू कर दिया | मेरे दिन अच्छे कट रहे थे | एक दिन उस बूढ़े को पता चल गया | उसने मुझसे जवाब माँगा तो मैंने उसी दम गला घोटकर उसे मार डाला...

तुझ जैसे को सँभालना कोई मुश्कील नहीं था | मैं दवाई पिलाता रहा, तू बेहोश होता रहा और मेरी तस्वीरें बनती गयीं | एक दिन तस्वीर उतारते वक्त एक बच्चा मेरे हाथों मारा गया | मैंने उसे हवेली के पीछे दफ़ना दिया | उस दिन से मेरा शौक बढ़ गया | अब तस्वीर खत्म होने के बाद, मैं उस इंसान को मार डालता और उसकी लाश को हवेली के पीछे गाड़ ऊपर पौधा लगा देता और तस्वीर को हवेली की दिवारोंपर टाँग देता | आज भी वही करने वाला था, पर इस लड़की को देखकर मेरी कामना जागृत हो उठी | लेकिन शायद दवाई कम पड़ गयी जो तुझे सब पता चल गया | चल कोई बात नहीं | बहती गंगा में तू भी हाथ धो ले | वैसे भी कौनसी लड़की तुझ जैसे के करीब आयेगी | चल, आ जा..." सोहन सब सुनता रहा | ऐसा कुछ उसे सुनने और देखने मिलेगा यह बात उसे सही नहीं जा रही थी | गुस्से होकर सोहन ने शंभू का गला पकड़ लिया | कमजोर सोहन को दूर हटाना शंभू के लिये कोई मुश्कील नहीं था | शंभू ने झटके से सोहन को धकेल दिया | लड़खड़ाता हुई सोहन काँच की अल्मारी से टकराया | शंभू के सरपर जुनून सवाँर था | उसने उसी वक्त काँच का टुकड़ा उठाया और सोहनपर वार किया | शंभू वार करता रहा और सोहन चिल्लाता रहा | उसी वक्त उस लड़की को होश आ गया...
                                                 
सोहन की हालत देख वह जोर से चिल्लाई और बाहर की तरफ भागी | लड़की को बाहर जाता देख शंभू ने काँच का टुकड़ा फेंक दिया और, "तुझे बाद में देखता हूँ..." यह कहकर उस लड़की के पीछे भागा | खून में लथपथ सोहन जमीनपर गिर पड़ा | तड़पता हुआ रेंग रेंगकर वह किसी तरह घड़ी के पास पहुँचा और बेहिसाब जख्मों से उठते दर की वजह से उसने दम तोड़ दिया | साँस रोकर शेखर और इंस्पेक्टर के साथ हवलदार भी यह सब देख रहे थे | यकायक सोहन की लाश चमकने लगी | एक सफेद रौशनी सोहन की लाश को आँखों के रास्ते छोड़ती हुई घड़ी के अंदर चली गयी | उसी वक्त हाँफता हुआ शंभू अंदर आ गया | अंदर आते ही उसने दरवाजा बंद कर दिया | बाहर से बहुत सारे लोगों की आवाज़ें आ रही थी | "सोहन दरवाजा खोलो... आज तेरी खैर नहीं... बाहर आ सोहन..." इन आवाज़ों से शंभू ड़र गया | उसने सोहन की ओर देखा | उसकी खुली आँखें देखकर शंभू को यकीन हो गया कि सोहन मर चुका है | अब शंभू फँस चुका था | तभी सब तरफ से धुआँ उठने लगा | शंभू कुछ करता इससे पहले ही गाँववालों ने लगाई आग चारो ओर फैल गई | आग में झुलसकर शंभू मर गया | उसके जलते बदन से काला धुआँ उठा और देखते ही देखते उसने शंभू का रूप ले लिया | अपने हाथ में खून से सना वहीं काँच का टुकड़ा लेकर शंभू बोला, "हा...हा...हा... मुझे कोई रोक नहीं सकता | अब मैं और शक्तिशाली बन गया हूँ | हा...हा...हा..." इतना कहकर शंभू की रूह स्टँडपर रखे कँव्हासपर काँच से खरौंच ने लगी | यह देख सोहन चीखने लगा, "गाँवावालों... तिपाये पर रखे इस कँव्हास को नश्ट कर दो... वरना यह हैवान किसी को नहीं छोड़ेगा..." मगर सोहन की आवाज़ की जगह घड़ी के घंटे ने पुकार लगाई, "टन... "

रौशनी की बहुत बड़ी दिवार सबको पार करती हुई निकल गई और सन्नाटे के साथ सब तरफ अंधेरा छा गया | काई और मकड़ी के जालों के अलावा उस कमरे में काली पड़ी हुई घंटेवाली घड़ी ओर पुरानासा ड्रॉईंग का कँव्हास, दोनो धुंधले दिखाई दे रहे थे | शेखर बोल पड़ा, "इसका मतलब, आजतक हम समझते रहे कि इस सबके पीछे सोहन है | लेकिन असल में वह शंभू था जो सोहन का नाम और उसकी बिमारी की आड़ लेकर जुर्म करता रहा सोहन तो बेचारा घड़ी के घंटों की आवाज़ से लोगों को इशारा करता रहा लेकिन कोई उसके इशारे को समझ नहीं पाया |" शेखर की बात सुनकर इंस्पेक्टर ने कहा, "हां मि. शेखर, सोहन निर्दोष है | असली गुनाहगार तो वह शंभू है |" शेखर और इंस्पेक्टर बोल ही रहे थे कि घड़ी के काँटे हिलने लगे | घड़ी के शीशे से एक सफेद धुआँ उठा और देखते ही देखते धुएँने सोहन का रूप ले लिया | सोहन ने अपने हाथ जोड़कर सबको अभिवादन किया और धीरे-धीरे गायब होते धुएँ के साथ सोहन मुक्त हो गया |

यह सब देखकर शेखर बोला, "सोहन की आत्मा पर कसूरवार होने का बोझ था, आज वह बोझ हट गया तो सोहन को मुक्त होने का रास्ता मिल गया |" शेखर की बात सुनकर एक हवलदार बोला, "सर, वह शंभू अभी भी है |" दूसरा हवलदार बोल पड़ा, "सर, एक बात मुझे याद आई है | बीते समय की घटनाओं में जब शंभू उस लड़की के पीछे कमरे से बाहर गया, तब यह लॉकेट उसके गले में था | लेकिन जब वह वापस आया तब वह लॉकेट उसके गले में नहीं था | हो सकता है बाहर जाते वक्त या वापस आते वक्त यह लॉकेट शंभू के गले से निकल गया होगा |" यह सुनकर इंस्पेक्टर बोला, "येस, यू आर राईट... शंभू वह अकेला शक्स था जो ज़िंदा हवेली के अंदर-बाहर आता-जाता था और यह लॉकेट भी शंभू का है | इसी लॉकेट की वजह से भावना इस हवेली से ज़िंदा बाहर जा सकी | भावना से पहले कोई भी इस हवेली से ज़िंदा बाहर नहीं आ सका था लेकिन उस लॉकेट की वजह से भावना हवेली में बच गयी | तब शंभू को गुस्सा आ गया और उसने भावना को..." इंस्पेक्टर की बात सुनकर शेखर गुस्से से देखने लगा | आगे जाते हुए उसने कहा, "मैं अब इस शंभू को नहीं छोडूँगा... अब इसका विनाश तय है |" "मेरा विनाश करेगा तू..."

शेखर बोल ही रहा था कि इस आवाज़ से सब चौंक गये | सबने देखा तो काले धुएँ का एक भँवर कँव्हास के चारों ओर घूम रहा था | भँवर में बिजली चमकने लगी और कँव्हास हवा में उड़कर घूमने लगा | एक बार फिर बिजली चमकी और शंभू बोलने लगा, "मूर्खों, सोहन कमज़ोर था | तुम्हें क्या लगता है, मैं भी वैसा ही हूँ... हा...हा...हा... मैं उस वक्त भी कमज़ोर नहीं था | उस लड़की को भी तस्वीर बनाने के बाद मैं मार देता लेकिन उसे देखकर मन ललचा गया | मेरे जबरदस्ती करने से वह बेवकूफ चिल्लाने लगी और उस कमबख्त सोहन को पता चल गया | क्या करता मैं... मारना पड़ा सोहन को | लड़की को जंगल में पकड़ लिया और वहीं उसके साथ...... फिर गला घोंटकर मार डाला उसे | हवेली ले जाकर पीछे की तरह उसे दफना ही रहा था कि गाँववाले आ गये | मैं यहां छुप गया | उन गाँववालों ने हवेली को ही जला दिया और मैं भी आग में जल गया | मेरा शरीर मीट गया तो क्या | मेरी रुहानी ताक़त का अंदाज़ा नहीं है तुम्हें | अबतक नौ सौ सत्तानवे बली चढ़ा चुका हूँ मैं | तुम चारों की बली चढ़ाने के बाद अमर हो जाऊँगा मैं... हा...हा...हा..."

बिजलियाँ चमकने लगीं | काला भँवर और बढ़ता गया | शेखर, इंस्पेक्टर और दोनों हवलदारों को निगलता हुआ ऊपर चला गया | पीछे, हवा में घूमता हुआ कँव्हास जमीनपर आकर खड़ा हो गया | भँवर में फँसे चारों लोग गुलाटियाँ खा रहे थे | क्या हो रहा है उन्हें कुछ पता नहीं चल रहा था | यकायक भँवर ने सबको उगल दिया | चारों ने देखा तो खुद को हवेली के ऊपरी हिस्से में पाया | वह भँवर तेज़ीसे चारों तरफ घूम रहा था | बिजलियाँ चमकने लगीं और धुएँ का भँवर गायब हो गया | सब लोग एक-दूसरे की ओर देख रहे थे | एक हवलदार बोला, "यह तो हम हवेली के ऊपरी हिस्से में हैं |" दूसरे हवलदार ने कहा, "और यहां से बाहर का कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा है | अब क्या करें हम..." हवलदार के काँधेपर हाथ रखते हुए इंस्पेक्टर बोला, "देखो, हौसला रखो | यहां से बाहर जाने के अलावा शंभू की आत्मा को नष्ट कैसे करें यह भी हमें सोचना है, और वह भी जल्दी |" इंस्पेक्टर की बात को तोड़ते हुए शेखर ने कहा, "आत्मा को नष्ट नहीं किया जा सकता | आत्मा तो चेतना है | उसे मुक्त करने का कोई उपाय सोचना होगा | शंभू की दो चीज़ें इस वक्त हवेली में मौजूद हैं | एक तो वह कँव्हास और दूसरा यह लॉकेट | इन दोनों को अगर नष्ट कर दें तो..." शेखर बोल ही रहा था कि, "आऽऽऽऽऽऽऽऽ..."

काले भँवर ने सबके देखते ही देखते एक हवलदार को खींच लिया और ऊपर की मंजिल पर ले गया | हवलदार की चीख थम गयी और बाकी बचे तीनों भँवर के पीछे भागते हुए ऊपर पहुँच गये | सब तरफ अंधेरा था | इंस्पेक्टर के इशारे पर हवलदार ने टॉर्च जलाया | बरामदे के अंत में कोई ज़मीन पर पड़ा हुआ था | वहाँ पहुँचकर सबने देखा तो वही हवलदार था | उसकी गर्दनपर इस कदर लाल निशान थे मानो जैसे किसी ताक़तवर हाथों ने पूरा ज़ोर लगाकर उसका गला दबाया हो | कुछ पल तीनों लाश को देखते रहे | अचानक शेखर को कुछ खयाल आया और वह नीचे की ओर भागा | इंस्पेक्टर और हवलदार शेखर के पीछे ही थे | नीचे पहुँचकर शेखर ने चारो तरफ देखा | एक दिवारपर लगी खाली फ्रेम में अब उस हवलदार की तस्वीर नज़र आ रही थी | फटी आँखों से तस्वीर की तरफ देखते हुए शेखर बोला, "इंस्पेक्टर साहब, इस हवलदार को शंभू ने कितनी आसानी से मार डाला | हमें वह लॉकेट और कँव्हास को नष्ट करना ही होगा, नहीं तो हम और मुश्कील में फँस जाएँगे |" "हम... हा...हा...हा... हम नहीं... तुम मुसीबत में फँस चुके हो..."

इस आवाज़ से शेखर चौंक पड़ा | उसने पीछे देखा तो इंस्पेक्टर नदारद था | "इस्पेक्टर साहब, सर... कहाँ हैं आप..." शेखर चिल्लाते हुए हवेली में भाग ही रहा था कि ऊपर से कोई नीचे आ गिरा | शेखर ने उस गिरे हुए आदमी को देखा तो वह घबरा गया | वह इंस्पेक्टर था | उसकी भी गर्दन मरोड़ दी गयी थी | सहमते हुए शेखर ने दिवार की ओर देखा | एक खाली फ्रेम में इंस्पेक्टर की तस्वीर नज़र आने लगी और उसी वक्त दूसरी खाली फ्रेम में बचे हुए हवलदार की तस्वीर देखकर शेखर दंग रह गया | अपने पीछे खड़े हवलदार की ओर शेखर ने देखा | जैसे ही बिजली चमकी वैसेही शेखर की मानो साँस ही रुक गयी | उस हवलदार का चेहरा पूरा सफेद था | उसकी आँखें लाल थी और गर्दन एक तरफ मुड़ी हुई थी | थरथराते हुए शेखर बोल पड़ा, "ह... हवलदा...र..." वह आकृती हँसने लगी और अलग ही आवाज़ में बोल पड़ी, "कौन हवलदार... वह थानेदार और उसके दोनो साथी उसी वक्त मारे गये जब तुम सब ऊपर पहुँचे | मैं शंभू हूँ, और तू है एक हज़ार एकवाँ बली | यानी मेरा आखरी शिकार | लेकीन तुझे में बाकी सबकी तरह आसान मौत नहीं दूँगा | तड़पा तड़पाकर मारूँगा |" यह कहते ही उस आकृती ने शेखर को गले से पकड़कर हवा में उड़ाया | हवा में ही पीछे जाते हुए शेखर दिवार से टकराया और नीचे आ गिरा |

ज़ोर के झटके की वजह से शेखर की पीठ में दर्द उठा | वह जैसे-तैसे खड़ा हो रहा था | हवलदार की आकृती उसकी तरफ बढ़ते हुए बोली, "सच ही कहा था उस बाबा ने... मेरी आखरी बली से पहले मुझे इंसानी शरीर प्राप्त होगा | बाबा की वह बात मुझे आज समझ आई है | आजतक जितने लोगों की मैंने बली दी, उन सबके शरीरों में घूसने की कोशिश की थी मैंने, लेकिन नाकाम रहा | आज इतने सालों बाद इस आदमी के शरीर को हथियाने में मैं कामयाब हो गया | अब तुझे मारते ही मैं अमर हो जाऊँगा | हा...हा...हा..." हवलदार की आकृती को करीब आता देखकर शेखर तुरंत इंस्पेक्टर की लाश की ओर बढ़ा | सर से पैर तक इंस्पेक्टर को टटोल रहे शेखर के पास पहुँचकर हाथ का लॉकेट दिखाते हुए आकृती बोली, "जिसे तुम ढूँढ़ रहे हो वह तावीज़ यह रहा | अब यह तुम्हारे किसी काम का नहीं है... मेरे जीते जी यह मुझे कुछ नहीं कर सका तो अब मेरा क्या बिगाड़ लेगा... हा...हा...हा..." लॉकेट की तरफ लपकते हुए शेखर का हाथ आकृती ने पकड़ लिया | लॉकेट को फैंककर आकृती ने शेखर के हाथ को घुमाया | शेखर हवा में गुलाटी खाता हुआ फिर ज़मीनपर आ गरा | उसका का सिर और चेहरा ज़ख्मी हो गया | किसी तरह शेखर सीढ़ियों तक पहुँचा और ऊपर चढने लगा | शेखर के पीछे आती आकृती ज़ोरसे हँसते बोली, "हा...हा...हा... अपनी मौत से भाग रहे हो..." यह सुनकर शेखर और ड़र गया | तेज़ी से सीढ़ियाँ चढ़ते हुए शेखर ऊपर पहुँच ही रहा था कि नीचे से आकृती ने ऊपर देखा, मुस्कुराया और उसी वक्त आकृती ने ऊपर छलांग लगाकर शेखर को गले से उठाकर फैंक दिया |

छत की दिवार से टकराकर शेखर सीधा नीचे आ गिरा | पूरी तरह से ज़ख्मी और खून में लथपथ शेखर को चलना भी मुश्किल हो रहा था | शेखर खुदको घसीटने लगा | एक जगह उसे नीचे जाती सीढ़ियाँ नजर आईं | सीढ़ियाँ उसी तहखाने में जा रहीं थीं जहाँ कुछ देर पहले शेखर और इंस्पेक्टर थे | तभी शेखर के हाथ कोई चीज़ लग गई | शेखर ने देखा तो वह शंभू का लॉकेट था | शेखर ने सोचा, "लॉकेट हाथ में है | तहखाना सामने है | यही मौका है..." यह सोचते ही शेखर ने खुदको सीढ़ियों की ओर धकेला | लुड़कते हुए शेखर तहखाने में पहुँचा | बीचों बीच वह टूटा हुआ कँव्हास था | शेखर किसी तरह दिवार का सहारा लेते हुए खड़ा हो गया | उसने जेब से लायटर निकाल लिया और शंभू का इंतज़ार करने लगा | वहाँ शेखर को नीचे जाता देख वह आकृती भी नीचे कूद पड़ी और पलभर में ही तहखाने पहुँच गयी | उसने सामने देखा तो एक हाथ में लॉकेट और दूसरे हाथ में जला हुआ लायटर लिये शेखर खड़ा था | शेखर ने, "शंभू, आजतक बहुत जुर्म किये तूने | अब बस |" यह कहकर लॉकेट को जलाया और कँव्हास की ओर फैंका | जलता हुआ लॉकेट कँव्हास की तरफ जाता देख उस आकृतीने भी कँव्हासपर छलांग लगाई | आग के शोले भड़के | लॉकेट और कँव्हास के साथ वह आकृती भी जलने लगी | शंभू की दर्दनाक चीखें सब जगह घूमने लगी | यकायक बड़ा विस्फोट हुआ और झटके से शेखर पीछे फैंका गया | नीचे गिरते ही शेखर बेहोश हो गया |

थोड़ी ही देर में शेखर को होश आ गया | उसने अपने आपको टटोला | खून सूख चुका था लेकिन दर्द आभी भी था | उसने सामने देखा तो ज़मीन पर पड़ी राख का ढ़ेर नज़र आ रहा था | चारों ओर से हलकी हलकी रौशनी दिखाई दे रही थी | खुदको सँभालते, पत्थरों का सहारा लेते हुए शेखर खंड़र से बाहर आया और धीरे-धीरे आगे चलने लगा | उसने एक बार पीछे मुड़कर खंड़र को देखा और जंगल में घूस गया | थोड़ी ही देर में शेखर रास्तेपर खड़ी पुलीस की जीप तक पहुँचा | अंदर से पानी की बोतल उठातर पी ही रहा था कि दयाल काका वहां आ गये | ने शेखर से कहा, "अरे बाबू, यहाँ क्या कर रहे हैं... इतने ज़ख्मी कैसे हो गये... और यह पुलीस की जीप... इंस्पेक्टर बाबू कहाँ हैं..." शेखर मुस्कुराया | दयाल काका के काँधेपर हाथ रखकर बोला, "इंस्पेक्टर अब बहुत दूर चला गया है | लेकिन जाने से पहसे उसने इस इलाके को और जंगल को उस भूतिया हवेली की दहशत से आज़ाद कर दिया है |" यह बात सुनकर दयाल काका  खुश हो गये | दोनों आगे चलने लगे | शेखर ने दयाल काका से, " क्या में आपकी तस्वीर उतार सकता हूँ..." यह पूछते हुए पीछे देखा | उसी वक्त उसकी आँखों का रंग बदल गया और उसके चेहरे के ऊपर शंभू का धुँधलासा चेहरा नज़र आने लगा | शंभू अजीब ढंग से मुस्कुरा रहा था |

समाप्त.

@ अनिकेत परशुराम आपटे.

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