युद्ध - पहला भाग...
रौशनी धीरे-धीरे कम होती जा रही थी | अंधेरा अपनी बाहें पसार रहा था |
हर तरफ आग और शोलों की बरसात हो रही थी | लोग
घायल हो रहे थे, मर रहे थे | दूर
क्षितिज पर काले धुँए में लिपटी तलवार हाथ में पकड़े शैतान राजा दुष्किर्ती हँस
रहा था, "हा...हा...हा... मैं अजेय हूँ... अब मुझे कोई
परास्त नहीं कर सकता... मेरा कोई अंत नहीं कर सकता... हा...हा...हा..."
हँसते-हँसते दुष्किर्तीने तलवार का रुख एक तरफ किया | तलवार
से लाल किरनें निकली और सामने विस्फोट होने लगे | इंसान जलकर
तुरंत भस्म होने लगे | तभी तीन दिव्य मानव दुष्किर्ती के
सामने प्रकट हुए | अलौकिक शक्तिवाले उन तीन मानवों ने अपने
हाथों में शस्त्र सँभाल रखे थे | एक मानव चिल्लाकर बोला,
"दुष्ट, दुराचारी... बंद कर यह विनाश,
अन्यथा..." दुष्किर्ती और जोर से हँसते हुए बोला, "हा...हा...हा... अन्यथा... कौन रोकेगा मुझे... तुम क्षुद्र मानव...
हा...हा...हा... कर लो प्रयास..." कहते कहते दुष्किर्ती ने अपनी तलवार की नोक
को अपने माथेपर लगाया और उसका आकार बढ़ने लगा | देखते ही
देखते शैतान राजा दुष्किर्ती, काले धुँए में लिपटा, एक बहुत बड़े आकार का, आँखों से आग उगलता हुआ
विद्रूप राक्षस बन गया | सामने खड़े उन तीन मानवों की ओर देख
दुष्किर्ती दहाड़ते हुँए हँसने लगा...
हजारों साल बीत गये...
अंधेरा बढ़ता जा रहा था |
कीड़ों की गुनगुन और जानवरों की आवाजों के साथ हवा के कारन हिलते
पत्तों की आवाजों की वजह से जंगल और भी डरावना हो गया था | पथरीले
रास्तोंपर लड़खड़ाती, डालियों और पेड़ों से बचती-बचाती एक
लड़की बेतहाशा भागी जा रही था और कुछ जंगली भेड़िये उसका पीछा कर रहे थे | यकायक वह लड़की ठोकर खाकर गिर पड़ी | उसे गिरता देख
वह भेड़िये भी रुक गये | उस लड़की ने मुड़कर देखा तो दो
भेड़िये धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे | दोनों उस लड़की पर झपटे
ही थे, कि अचानक कहींसे दो तीर निकल आये | एक तीर एक भेड़िये की गर्दन में जा लगा और दूसरे ने दूसरे भेड़िये के माथे
को निशाना बनाया | दोनों भेड़िये एकसाथ लड़की के सामने गिरकर
मर गये | अपने साथियों को गिरा देखकर बाकी भेड़िये अपने कान
मुड़कर, यहाँ-वहाँ देख पीछे जाने लगे और कुछ ही देर में
अंधेरे में भाग गये | डरी, सहमी वह
लड़की चारों तरफ देखने लगी | तभी कुछ कदम उसके नजदीक पहुँच
गये | पत्थर पर पत्थर घिसकर चिंगारी पैदा होकर पास के कुछ
पत्तों पर पड़ी और आग जल उठी | आग की हलकी सी रौशनी में उस
लड़की ने देखा, तो पीठ पर तीर भरे तुणीर, कमरपर तलवार और काँधेपर धनुष लटकाये दो युवक सामने खड़े थे | उनमें से एक ने लकड़ी का एक टुकड़ा लिया और पत्तों पर लगाकर उसकी मशाल बना
ली | दुसरा युवक उस लड़की के पास जाते हुए बोला,
"शांत हो जाइये | वह भेड़िये भाग गये हैं
| मेरा नाम सोहम है, और यह मेरा भाई,
शिवम | हम दोनों शिकार खेल रहे थे | रात हो गयी तो यहीं डेरा डाल लिया |" तभी शिवम
ने पास आते हुए पूछा, "आप कौन हैं ? और यहाँ क्या कर रहीं हैं ?"
अपने आपको सँभालते हुए वह लड़की खड़ी हो गई |
फिर सोहम और शिवम की ओर देखते हुए बोली, "मैं कौन हूँ यह जानने से पहले मैं यहाँ क्यौं हूँ यह जानलो | हज़ारों साल पहले दुष्किर्ती नाम का एक पराक्रमी राजा हुआ करता था |
वह जितना शक्तिशाली था, उतना ही पापी था |
उसे सारे संसार पर राज करना था | इसलिए उसने
घोर तपश्चर्या कर भगवान शंकर से वर प्राप्त कर लिया | भोलेनाथ
ने दुष्किर्ती को सफेद रौशनी में लिपटी हुई एक तलवार भेंट की और यह वरदान दिया,
कि मन की शक्ति से बल पाकर चलनेवाली यह तलवार दुष्किर्ती को हर
युद्ध में अपराजित रखेगी और इस तलवार के वार से ही उसका अंत हो सकेगा | यह कहकर महादेव लुप्त हो गये |
सफेद धुँए में लिपटी वह तलवार जैसे ही दुष्किर्ती
के हाथ में आई, वैसे ही उसके शरीर में एक बिजलीसी
दौड़ गयी | देखते ही देखते सफेद धुँआ कम होकर तलवार काली पड़
गयी और काले धुँए में घिर गयी | काले मन के राजा दुष्किर्ती
ने अपने काले विचारों को उस तलवार में प्रविष्ट करा दिया | अब
वह अमर हो गया था | उसने चारों ओर अपनी विनाश लीला आरंभ कर
दी | सारे संसार की दुर्दशा देख स्वर्ग में समस्त देवता
भयभीत हो गये | धरतीपर कब्ज़ा करने के उपरांत दुष्किर्ती
स्वर्गलोकपर भी आक्रमण कर सकता है यह सोचकर सारे देवता शिवजी के पास पहुँचे |
शिवजी ने ब्रह्मदेव और भगवान विष्णू की सहायता से तीन चमत्कारी वीर
मानवों का निर्माण कर, दुष्किर्ती को रोकने के लिए उन्हें
धरतीपर भेज दिया |
राजा दुष्किर्ती और उन तीन महावीरों मे घमासान
युद्ध हुआ | दुष्किर्ती को परास्त करना अथवा
उसका वध करना संभव नहीं था | सारे संसार को निगलने के लिए
दुष्किर्ती ने अपनी तलवार से काली दुनिया का द्वार खोल दिया था | उन तीन महावीरों ने योजना बनाकर दुष्किर्ती को ही काली दुनिया में फैंक
दिया | गिरते गिरते दुष्किर्ती के हाथसे उसकी तलवार छूट गयी |
तीनों महावीर उस तलवार को थामते इससे पहले दुष्किर्तीने अपने हाथों
से लाल रौशनी को तलवारपर भेजा | काली दुनिया का द्वार बंद हो
गया और दुष्किर्ती वहाँ कैद हो गया | लाल रौशनी तलवारपर
पड़तेही तलवार हवा में उड़ गयी | हवा में ही उसके तीन टुकड़े
होकर दूरदूर बिखर गये | हज़ारों वर्ष बीत गये | काली दुनिया में कैद दुष्किर्ती का शरीर तो मिट गया, परंतु उसकी आत्मा काली शक्तियों की वजह से और बलवान हो गयी | हज़ारों वर्ष उसने बाहर आने का प्रयास किया परंतु वह सफल नहीं हो पाई |
उन तीन महावीरों ने एक मंदिर बनाकर वहाँ अपनी
शक्तियों को सुरक्षित रख दिया | मैं देवयानी हूँ
| उसी मंदिर की देवी | आज इतने वर्षों
के बाद मंदिर की रौशनी कम हो गई और मंदिर काला पड़ने लगा | मंदिर
की छतपर तीन निशान दिखाई देने लगे | वह तीनों निशान उन तीन
स्थलों के थे जहाँ दुष्किर्ती की तलवार के टुकड़े थे | मुझे
मानव शरीर प्राप्त हुआ और उन तीनों टुकड़ों को ढूँढ़कर नष्ट करने का कार्य मुझे
सौंपा गया | एक टुकड़ा मौत के समुद्र में है, दूसरा है काले पर्बतों में स्थित एक गुफा में और तीसरा यहाँ, इस जंगल में | मैं यहाँ उसी टुकड़े की तलाश में आई
थी | टुकड़ा तो मुझे मिल गया, लेकिन वह
भेड़िये मेरे पीछे पड़ गये | भागते हुए मैं यहाँ गिरी और वह
टुकड़ा मेरे हाथों से छूट गया | आगे क्या हुआ यह तो तुम
दोनों के ज्ञात है ही |" सोहम और शिवम यह सब सुनकर दंग
रह गये |
देवयानी ने आगे कहा, "उन तीनों टुकड़ों को मंदिर में लेजाकर नष्ट करना होगा ताकि काली शक्तियों
का सदा के लिए अंत हो सके |" शिवम ने खड़े होते हुए कहा,
"आप जो कह रहीं हैं वह अगर सच है तो इतने साल सबकुछ शांत कैसे
था ? यकायक अब यह सब कैसे शुरू हो गया ? और हमारे नाम के सिवा कुछ ना जानते हुए आपने यह सब हमें क्यौं बताया ?
सोहम, यह लड़की मनघड़ंत कहानी बनाकर हमें बहला
रही है | मैं अपने तंबू में वापस जा रहा हूँ | तुम्हें यहाँ रुकना है तो रुको, नहीं तो चलो मेरे
साथ |" यह कहकर देवयानी कुछ कहे इससे पहले शिवम एक तरफ
चलने लगा | देवयानी को खड़ी होने में मदद कर सोहम बोला,
"देवयानी, शिवम पूरी तरह गलत नहीं है |
आपकी बातोंपर विश्वास रखना थोड़ा कठिन है | इस
समय आप हमारे साथ चलें | यहाँ रुकना ठिक नहीं |"
सब चलने ही लगे थे कि एक पेड़ के पास काले धुँए का एक छोटा बादल
सबको नज़र आया | शिवम ने उस बादल को हटाकर देखा तो एक काली
नोंकीली चीज़ वहाँ पड़ी थी | शिवम उस चीज़ को उठाने के लिए
झुका ही था कि, "छूना मत उसे..."
लेकिन देवयानी के यह कहने से पहले ही शिवम का हाथ
उस चीज को छू गया था | एक तेज लाल रौशनी उस
चीज से निकली और शिवम के शरीर का चक्कर लगाकर वापस उसी चीज में चली गयी | कोई कुछ और करे इससे पहले काले धुँए का वह बादल बढ़ने लगा और शिवम के शरीर
को घेरने लगा | कुछ ही पलों में वह बादल शिवम को पूरी तरह
ढँककर उस चीज में वापस जाने लगा | "सोहम, मुझे बचा ले भाई..." शिवम की यह पुकार सुनकर सोहम उसकी तरफ लपका |
लेकिन, "नहीं सोहम, तुम उसे नहीं रोक सकते |" यह कहते हुए देवयानी
ने सोहम का हाथ पकड़ लिया | काले धुँए का वह बादल शिवम समेत
उस चीज में समा गया और वह चीज निश्तेज हो गयी |
सोहम की ओर देखते हुए देवयानी बोल पड़ी,
"सोहम, अब तो तुम्हें विश्वास हो गया
होगा, कि मैं जो कह रही हूँ वह सच है | यह काली चीज उसी तलवार का एक टुकड़ा है | अब भी
इसमें शक्ति बाकी है | इसी टुकड़े के मार्ग से शिवम अब उसी
काली दुनिया में पहुँच गया है जहाँ दुष्किर्ती की आत्मा कैद है | अंधेरे में तुम उन भेड़ियों को देख नहीं पाये | आकार
से बड़े वह जानवर उसी काली शक्ति से प्रेरित होकर इस टुकड़े की रक्षा कर रहे थे |
मैंने किसी तरह इस टुकड़े को हासील किया परंतू इन्हें पता चल गया और
वह मेरे पीछे पड़ गये |" यह कहते हुए देवयानी ने पास ही
पड़े एक रेशमी टुकड़े को अपने हाथ में लपेटकर उस चीज को उठा लिया | फिर सोहम की ओर देखते हुए कहा, "यह तीन रेशम के
कपड़े उन तीनों महावीरों के हैं जिन्हों ने वह मंदिर बनाया | यह कपड़े उन दुष्ट शक्तियों को काबू में रख सकते हैं, लेकिन कुछ समय के लिए |
दुष्किर्ती और उन तीन महावीरों में जब युद्ध आरंभ
हुआ,
तब अवकाश में ग्रहों एवं नक्षत्रों की एक विशिष्ट स्थिती थी |
दस दिन तक वह युद्ध चला | हर एक दिन
दुष्किर्ती की ताकत बढ़ती गई | दसवें दिन जब सारे ग्रह एवं
नक्षत्र अपने परम स्थान पर थे तब कुछ पल के लिए दुष्क्रिती की शक्ति का प्रभाव कम
हुआ और प्राप्त हुई दैवी शक्तियों की सहायता से उन तीन महावीरों ने दुष्किर्ती को
कैद कर दिया | इतने वर्षों के पश्चात, कल
रात पुन्ह वैसी ही ग्रहों एवं नक्षत्रों की स्थिती अवकाश में निर्माण हुई |
अब दुष्किर्ती की शक्ति बढ़ जायेगी | जिसका
प्रमाण है यह अंधेरा | कल पूर्णमाशी की रात थी, लेकिन अवकाश में चाँद नहीं था | बल पाती काली
शक्तियों ने चाँद को भी छुपा दिया है | दसवें दिन उस काली
तलवार को मंदिर में ले जाना होगा ताकि उसे नष्ट कर दुष्किर्ती की आत्मा को मुक्त
कराया जा सके | तो अब मेरे पास केवल नौ दिन बचे हैं |"
"मेरे नहीं, हमारे पास |"
देवयानी ने सोहम की ओर देखा तो सोहम ने कहा,
"हाँ देवयानी, मैं भी तुम्हारे साथ चल
रहा हूँ | वह काली शक्तियाँ कितनीही बड़ी क्यौं ना हो,
पर मेरा भाई उनकी कैद मैं है | वह जीवित है या
नहीं यह मैं नहीं जानता, पर उसे मैं अकेले नहीं छोड़ सकता और
शायद तुम्हें भी मेरी मदद की जरुरत पड़ जाये |" सोहम की
बात सुनकर देवयानी के चेहरेपर एक हलकीसी मुस्कान आ गयी | दोनों
बहुत थक चुके थे | सोहम के तंबू में पहुँचकर दोनों ने सोचा
कि वें थोड़ा विश्राम कर लें और सुबह आगे बढ़ें | करीब दो
घंटे बीत गये | सुबह होने में कुछ ही पल बाकी थे | एक जोरदार चीख से सोहम की आँख खुल गयी | तंबू से
बाहर झाँकते हुए उसने देखा तो जंगली भालू और भेड़ियों के बीच देवयानी हाथ में एक
लकड़े का टुकड़ा लिये खड़ी थी | वह जानवर आकार में बड़े और
रुहानी लग रहे थे | सोहम ने तुरंत ही अपना धनुष उठाया |
निशाना साधकर सोहम ने चलाया हुआ तीर भालू के
माथेपर जा लगा | दर्दभरी गुर्राहट से भालू गिर
पड़ा और तत्काल मर गया | सोहम को लगा कि यह देख वह भेड़िया
भाग जाएगा | लेकिन गुस्से से और भी लाल होकर वह सोहम की तरफ
लपका | सोहम ने तुरंत दूसरा तीर चलाया और भेड़िया रास्ते में
ही गिर पड़ा | सोहम को देख देवयानी उसकी ओर आई | लकड़ी का टुकड़ा फैंककर उसने कहा, “सोहम, तुमने मेरी रक्षा की, नहीं तो वह जानवर..."
देवयानी के कुछ और कहने से पहले सोहम की नजर उसके जख्मों पर पड़ी | सोहम ने कहा, "देवयानी, तुम
जख्मी हो | मैं लेप लगा देता हूँ | फिर
आगे का सोचेंगे |" दोनों तंबू में जाने लगे तभी अनेक
चीखों की आवाज से जंगल गूँज उठा |
दोनों ने देखा तो कई सारे भालू और भेड़िये उनकी
तरफ तेजी से आ रहे थे | सोहम ने अपनी तलवार
निकालते हुए कहा, "देवयानी, तुम
उस टुकड़े को लेकर यहाँ से निकल जाओ | मैं इन्हें सँभालता
हूँ |" वह जानवर पास ही आये थे, कि उगते सूरज की किरन
सोहम और देवयानीपर पड़ी | तभी प्रकाश के कारन सोहम की आँखें
चौंधिया गयी | उसी पल सामने से आनेवाले जानवरों को बिजली के
झटके लगे और वह सब वही ढेर हो गये | वह बिजली, जहाँ देवयानी खड़ी थी वहीं से आ रही थी | सोहम ने
देवयानी की ओर देखा | उसके सारे घाव भर चुके थे | उसका पूरा शरीर सफेद रौशनी में घिरा था और अपने हाथों को खोलकर वह बिजली
पैदा कर रही थी |
जब सारे जानवर मर गये तब देवयानी ने कहा,
"हां सोहम | मेरे पास उन तीन महावीरों की
शक्तियों की धरोहर है | लेकिन मनुष्यरूप में होने कि वजह से
मैं पूरे दिन में केवल एक ही बार इस शक्ति का प्रयोग कर सकती हूँ | फिर अगले दिन तक के लिए मेरी शक्तियाँ लुप्त हो जाती हैं |" देवयानी बोल ही रही थी कि उसके शरीर को घिरी रौशनी कम होकर वह फिरसे
सामान्य बन गई | सोहम यह सब देखकर दंग रह गया | देवयानी ने कहा, "अब और कोई संकट आए इससे पहले
हमें दूसरे टुकड़े की खोज में जाना चाहिए | दूसरा टुकड़ा
दक्षिण दिशा मे फैले मौत के समुद्र में कहीं है | खतरे और भी
गहरे हो सकते हैं | तुम अब भी मेरे साथ हो..." आशाभरी
नजरों से अपनी ओर देख रही देवयानी का हाथ अपने हाथ में लेकर सोहम ने कहा,
"हां देवयानी, मैं तुम्हारे साथ हूँ |"
दोनों जल्द ही जंगल पार कर किनारे तक पहुँचे |
दूर दूर तक काली रेत के सिवा कुछ नजर नहीं आ रहा था | चारों ओर देखते हुए सोहम बोला, "यह अजीब है |
हम समुद्र तट पर खड़े हैं, लेकिन ना कोई पेड़
दिख रहा है न कोई पक्षी |" बोलते हुए उसने देवयानी की
ओर देखा तो वह एक दिशा मे ताक लगाकर देख रही थी | उस ओर हाथ
कर देवयानी बोली, "सोहम, वह देखो |
वहाँ एक गुफा है | हमें वहाँ जाना चाहिए |
शायद हमें कोई सहायता मिल जाए |" सोहम ने
सिर हिलाया और दोनों गुफा की ओर चल पड़े | कुछ ही पलों में
दोनों गुफा के द्वारपर पहुँच गये | दोनों ने अंदर झाँका,
पर हवा और अंधेरे के सिवा वहाँ कुछ नहीं था | सोहम
ने पत्थर के टुकड़ों को घिसकर चिंगारी उत्पन्न की और पास पड़े लकडे़ पर उसे डालकर
रौशनी पैदा कर दी | मंद रौशनी में सोहम और देवयानी गुफा के
अंदर बढ़ने लगे |
गुफा के अंत में एक पत्थर की शीलापर एक पत्थर
मूर्ती खड़ी थी | ऐसे लग रहा, जैसे कोई ऋषी वहाँ खड़ा हो | मूर्ती की आँखों में डर
दिख रहा था और उसका एक हाथ सामने की तरफ था, मनो किसी को
रुकने के लिए कह रहा हो | देवयानी और सोहम ने एक दूसरे की ओर
देखा और मूर्ती के पास पहुँचे | "कौन हैं यह..? और यहाँ..." सोहम अपनी बात पूरी करता इससे पहले ही देवयानी का हाथ
मूर्ती को छू गया और गुफा में कंपन पैदा हो गये | मूर्ती में
दरारें पड़ने लगीं और यकायक मूर्ती का विस्फोट हो गया | अपनी
आँखे खोल देवयानी और सोहम ने सामने देखा तो सफेद रौशनी मे घिरे एक ऋषी वहाँ खड़े
थे | देवयानी को देख हाथ जोड़कर वह बोले, "धन्यवाद देवी | आपके स्पर्श से आज मैं धन्य हो गया |
मैं राजा आदित्यनाथ हूँ |
एक युद्ध में अपने परिवार का नाश होता देख मैं अत्यंत दुखी हो गया
और इस गुफा में आकर मोक्षप्राप्ती के लिए तपश्चर्या करने लगा | श्री विष्णू ने मेरी परीक्षा लेनी चाही | मैं सफल ना
हो सका और क्रोधीत होकर श्री विष्णू ने मुझे अनंत काल तक इस पत्थर की शीला में
रहने का श्राप दिया | मैंने उनसे मिन्नतें कीं, तब मुझे वरदान देते हुए श्री विष्णू ने कहा, "मानव
शरीर में स्थित कोई दैवी शक्ति तुम्हें स्पर्श करेगी तब तुम श्रापमुक्त हो जाओगे
और उसी पल तुम्हें मोक्ष प्राप्त होगा |" आज आपके
स्पर्श से वह श्राप मिट गया | इसलिए आपको मेरा धन्यवाद |"
आशीर्वादस्वरूप देवयानी ने अपना हाथ ऊपर उठाया | फिर सोहम की ओर देखते हुए वह बोले, "बालक,
तुम जिस यात्रापर निकल पड़े हो, उसमें और संकट
आएँगे | उनसे मुकाबला करने हेतु मेरा यह आशीर्वाद स्वीकार
करो |"
यह कहते हुए ऋषी आदित्यनाथ ने अपना हाथ उठाया |
तेज किरन उनके हाथ से निकलती हुई गुफा के बाहर चली गयी |
"मेरा आशीर्वाद तटपर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है | बड़ी शक्तीयों के साथ बड़ी कुर्बानिया जुड़ी होती हैं | अब जाओ, मेरा आशीर्वाद ग्रहण करो |" यह कहते हुए ऋषी आदित्यनाथ उन्हें घिरी रौशनी में विलीन हो गये | उस जगह को प्रणाम कर सोहम और देवयानी गुफा से बाहर आ गये | तटपर सारे शस्त्रास्त्रों से लैस एक बड़ीसी नाव खड़ी थी | सोहम और देवयानी उस नावपर सवार हो गये | तभी
आकाशवाणी हुई और आदित्यनाथ बोले, "बालक, यह नाव पानी और हवा दोनों में चल सकती है | कल्याणमस्तू
|" नाव शुरू हो गयी | दूर तक फैले
समुद्र की ओर देख सोहम बोला, "यह समुद्र इतना शांत
कैसे...? ना लहरे हैं ना आवाज है | पानी
का रंग भी काला है | ऐसा क्यौ...?"
समुद्र की ओर देखते हुए देवयानी ने कहा,
"यह बहुत पुरानी घटना है | यह समुद्र
पहले ऐसा नहीं था | वह तट भी यूँ वीरान नहीं था | पेड़, पौधे, पक्षी, लहरें, छोटे-बड़े समुद्री जानवर, यहाँ सबकुछ था | एक दिन यमराज इस समुद्र के उपरसे
गुजर रहे थे | तब लहरों की वजह से वह भीग गये | उन्हें क्रोध आ गया और उन्होंने अपने पाश को समुद्र की सतहपर दे मारा |
तब से यहाँ का पानी काला हो गया और सारे पेड़, पौधे सूखकर नष्ट हो गये | पक्षी यहाँ से उड़ गये |
और समुद्री जानवर..." देवयानी की बात खत्म ही हुई थी, कि नाव जोर जोरसे हिलने लगी और यकायक नाव के चारों ओर से पहाड़ जितने लंबे,
काले धुँए में लिपटे हाथ पानी के बाहर आने लगे |
उन हाथों को देख देवयानी और सोहम दोनों स्तब्ध हो
गये |
एक जोर की दहाड़ के बाद लाल आँखोंवाला एक विशालकाय जीव बाहर आया |
सोहम ने झटसे तलवार उठाई और उन हाथों को काटने लगा | सोहम को देख देवयानी भी भाला लेकर उस दानव का मुकाबला करने लगी | जहाँ से दानव का हाथ कटता, वहीं से नया हाथ निकल आता | बहुत देर तक मुकाबला करने के बाद सोहम बोला, "यह
दानव तो बहुत शक्तिशाली है | हम कब तक इसका सामना कर
सकेंगे..." दानव के एक हाथ को दूर धकेलती हुई देवयानी बोली, "सोहम, उस दानव की आँखें... उनपर निशाना लगाओ |"
उस दानव की आँखों की तरफ देखते हुए पलभर के लिए सोहम का ध्यान हट
गया और विशालकाय हाथ की मार से सोहम दूर फैंका गया |
दूसरी तरफ दानव के एक हाथ ने देवयानी ने पकड़ा
भाला गिरा दिया | हाथ उसे जकड़ने ही
वाला था, कि तेजीसे कुछ चीजें देवयानी के ऊपर खड़े दानव के
हाथ से और सोहम के सामने खड़े दानव के हाथ से टकराईं | एकसाथ
दो विस्फोट हुए और दानव के दोनों हाथ कटकर पानी में जा गिरे | दानव सहित देवयानी और सोहम ने वह विस्फोट जिस दिशा से आए थे वहाँ देखा |
हवा में एक जहाज था और उसपर एक लड़की एक हाथ में मशाल और दूसरे में
तलवार लिये खड़ी थी | उसके सामने एक बहुत बड़ी तोप रखी थी |
लड़की ने फिर से तोप चलाई | फिर से दो विस्फोट
हुए और उस दानव के और दो हाथ कटकर पानी में गिर गए | गुस्से
से आगबबूला होकर दानव जहाज की तरफ मुड़ा | दानव का ध्यान
नावपर से हटा देख देवयानी चिल्लाई, "सोहम, यही अवसर है |"
दानव ने उसके बचे हुए हाथों से जहाज को जकड़ना
शुरू किया | तभी देवयानी का इशारा समझकर सोहम
ने तुरंत अपना धनुष उठाकर एकसाथ दो तीरों से निशाना साधा और तीर चला दिये |
दोनों तीर अपने अपने निशानेपर जा लगे | दानव दहाड़
मारकर चिल्लाने लगा | उसकी आँखों से काला रक्त बहने लगा |
जहाज को जकड़े हुए दानव पानी ते नीचे जाने लगा | सोहम लड़की की तरफ हाथ कर चिल्लाया, "बचो..."
जहाज के टुकड़े होते देख लड़की तलवार को मयान में रख ने पानी में छलांग लगा दी |
जहाजसमेत दानव पानी के नीचे चला गया | सोहम ने
रस्सी फैंककर लड़की को ऊपर खींच लिया | कृतज्ञताभरी आँखों से
लड़की ने सोहम और देवयानी को देख अपना सिर झुकाया | देवयानी
ने पूछा, "अभी कुछ पल पहले तक तो वह जहाज यहाँ नहीं था |
तुम अचानक कैसे आ गयी...? कौन हो तुम...?"
लड़की हँसकर बोली, "मेरा नाम वीरा है | मैं समुद्री लुटेरों के सरदार,
संग्राम सिंह की बेटी हूँ | बाबा कई महिने
बाहर थे | एक दिन हमारे परिंदे के हाथों उन्होने एक संदेसा
भेजा | उसमें लिखा था, कि एक काफिले को
लूटकर जब वह लौट रहे थे तब एक समुद्री तूफान में फँसकर उनका जहाज टूट गया और वह इस
मौत के समुद्र आ फँसे | फिर उन्होंने मदद के लिए यह संदेसा
भेजा | मेरा वह जहाज मेरे मन की इच्छा से हवा में चलता था |
उसी को लेकर मैं बाबा को ढूढ़ने यहाँ आई | आपको
संकट में देखा इसलिए मदद के लिए आई | लेकिन आप लोग कौन
हैं...? और यहाँ क्या कर रहे हैं...?" सोहम ने कहा, "मैं सोहम हूँ, और यह है देवयानी | रैशनी के मंदिर की देवी |"
सोहम ने जल्दी से सारा वृत्तांत वीरा को सुनाया और बोला,
"अब हम तलवार के उस दूसरे टुकड़े की खोज में यहाँ आए हैं |"
सोहम की बात सुनकर वीरा ने कहा,
"यह सब सचमुच अदभुत है लेकिन अथांग समुद्र में उस टुकड़े को
कहाँ..." वीरा बोल ही रही थी, कि पानी पर तैरता हुआ एक
लकड़े का बड़ा टुकड़ा उसे नजर आया | वीरा ने ध्यान से देखा
और चिल्लाई, "वह... वह... मेरे बाबा के जहाज का टुकड़ा
है | टुकड़ेपर हमारा निशान भी है | मतलब
बाबा यहीं कहीं हैं | बाबा... बाबा... मैं वीरा... कहाँ हैं
आप..." वीरा को धीरज बँधाकर सोहम पीछे मुड़ा, तो
देवयानी एक तरफ ताक लगाकर देख रही थी | उस तरफ इशारा कर देवयानी
बोली, "वह देखो... वह लाल रौशनी... इसका मतलब वह टुकड़ा
यहीं है | वीरा, और संभवत: तुम्हारे
बाबा भी | हमें पानी के अंदर जाना होगा |" देवयानी की बात सुनकर सोहम और वीरा ने सिर हिलाया | दोनों
की ओर देख सोहम बोला, “तुम दोनों यहीं रहो, मैं जाता हूँ |” देवयानी से रेशमी कपड़ा लेकर तुरंत
ही सोहम पानी में कूद गया |
लाल रौशनी की तरफ बढ़ता हुआ सोहम पानी के नीचे
जाने लगा | बहुत देर तैरने के बाद सोहम तल तक
पहुँच गया | एक तो पानी और दूसरे अंधेरा, सोहम को कुछ नजर नहीं आ रहा था | सिर्फ एक तरफ से
लाल रौशनी का एहसास हो रहा था | सोहम रौशनी की तरफ बढ़ ही
रहा था कि एक छोटी मछली ने उसका रास्ता रोका | उस मछली को
हटाने सोहम उसके पास गया तो उसने देखा कि मछली की आँखें काली हैं और वर काले धुँए
में लिपटी हुई है | यह मछली भी उसी काले जादू कि गिरफ्त में
है यह बात सोहम समझ गया | यकायक मछली की आँखें लाल हो गई और
उसका आकार तेजी से बढ़ने लगा | सोहम अपने आपको टटोलने लगा,
लेकिन उसके पास कोई भी हथियार न था | बढ़े हुए
आकार की वह मछली धिरे धिरे सोहम की ओर बढ़ने लगी |
सतहपर नाव में वीरा और देवयानी,
सोहम को लेकर चिंतित हो रहीं थीं | बार बार
पानी में झाँककर देख रहीं थीं | वहाँ पानी में, सामने आए संकट का सामना कैसे करें इस दुविधा में पड़े सोहम को पास ही एक
चमकती चीज नजर आई | उसने ध्यान से देखा तो रेंत में गढ़ा वह
एक बड़ा सा खंजर था | वह मछली सोहम को निगलने के लिए झपटी ही
थी, कि सोहम ने वह खंजर निकाला और एक तरफ हटकर उस झपटती मछली
के पेट में घौंप दिया | खंजर के लगते ही मछली की लाल आँखे नम
होती गईं और वह ढेर हो गई | मछली के इर्द-गिर्द घूमता हुआ
काला बादल भी कम हो गया | सोहम ने मछली के पेट से खंजर
निकाला और अपने पास रख लिया | सामने एक जगह से लाल रौशनी पनप
रही थी | सोहम धीरे-धीरे रौशनी के पास गया | वही तलवार का दूसरा टुकड़ा था | अपने पास के कपड़े
को निकालकर सोहम ने बिना टुकड़े को छुए उसे कपड़े से उठाया और तुरंत सतह की ओर चल
दिया |
सतहपर पहुँचकर नाव में चढ़ते हुए सोहम ने देवयानी
और वीरा की आशाभरी नजरों को देखा | अपने
हाथ में पकड़े कपड़े को सामने रख वह बोला, "यह है उस
तलवार का दूसरा टुकड़ा | वीरा, मुझे
तुम्हारे बाबा का कोई सुराग नहीं मिला | हमें..." सोहम
बोल ही रहा था की वीरा की नजर सोहम के हाथ में रखे खंजरपर पड़ी | खंजर छीनते हुए वीरा बोली, "बाबा का खंजर... यह
मेरे बाबा का खंजर है | यह देखो हमारा निशान | सोहम, यह तुम्हें कहाँ से मिला..." सोहम ने
देवयानी की ओर देखा | देवयानी के सिर हिलाते ही वह बोला,
"यह नीचे रेंत में फँसा हुआ था | जहाँ यह
खंजर था, उसके पास ही तलवार का यह टुकड़ा था |" देवयानी ने तलवार के टुकड़े को देखा और कहा, "इसके
दो अर्थ हैं | संभवत: तुम्हारे बाबा उस दानव से लढ़ते
हुए...... तब वह खंजर उनके हाथ से छूट गया या फिर... उन्हें तलवार का टुकड़ा मिला
होगा |
यदि उन्होंने उस टुकड़े को छुआ हो तो... वीरा,
या तो तुम्हारे बाबा उस दानव का शिकार बन गये या वे उसी काली दुनिया
में हैं जहाँ सोहम का भाई कैद है |" देवयानी चुप हो गयी
| क्रोधभरी आँखों से निकलते आँसू पोंछकर वीरा क्षितिज की ओर
देखने लगी | फिर सोहम और देवयानी को देखकर बोली,
"मैं भी तुम दोनों के साथ चलूँगी | मुझे
पता नहीं मेरे बाबा जिंदा भी हैं या नहीं | लेकिन अगर कहीं
वह जिंदा हैं, और उस काली दुनिया में हैं तो उन्हें वापस लाए
बिना मुझे चैन नहीं मिलेगा |" सोहम और देवयानी ने
एकदूसरे की ओर देखा | देवयानी ने एक तरफ इशारा करते हुए कहा,
"पश्चिम दिशा में काले पर्बत की चोटियाँ हैं | तलवार का तिसरा टुकड़ा वहीं पर कहीं है |" यह
सुनकर नाव को प्रणाम कर सोहम बोला, "कृपा कर हमें
पश्चिम दिशा में ले चलें |" देखते ही देखते नाव पानी से
ऊपर उठने लगी | फिर पश्चिम दिशा की तरफ मुड़कर आगे बढ़ने लगी
|
मौत के समुद्र को पार करने के बाद,
अनेक वनों, नदियों और पर्बतों को पार करती हुई
नाव कई दिनों तक पश्चिम दिशा में हवा से बातें कर रही थी | पश्चिम
दिशा की ओर देखते हुए सोहम के पास जाते हुए वीरा बोली, "आठ दिन हो गये हैं | हम अबतक उस काले पर्बतपर नहीं
पहुँचे | न जाने कब हमें वह तीसरा टुकड़ा मिलेगा और कब मैं
बाबा को वापस देखूँगी |" वीरा की ओर मुड़ता हुआ सोहम
कुछ कहे इससे पहले देवयानी ने एक तरफ इशारा करते हुए कहा, "वह देखो काले पर्बत के शिखर..." सोहम और वीरा ने देवयानी के किये
इशारे की ओर देखा तो काले पर्बत की चोटियाँ नजर आ रही थी | सारे
पेड़, जमीन, सब काले थे | ऐसा लग कहा था मानो किसीने सबकुछ काले रंग से ढँक दिया हो | तीनों एक दूसरे की तरफ देख ही रहे थे कि अचानक पर्बत से आती हुई लाल रौशनी
की किरनें उनकी नावपर आ लगी |
किरनें लगते ही नाव हवा में ही टूट गयी और तीनों
जमीनपर आने लगे | वीरा ने जल्दीसे अपने
कमरपर बँधी रस्सी को खोला और उसका फाँस बनाया | सोहम ने फाँस
को तीर में फँसाया और उसे एक पेड़ की ओर चला दिया | तीर पेड़
की एक मजबूत टहनी में जा लगा | वीरा, सोहम
और देवयानी ने रस्सी को पकड़ा और हवा में झूलते हुए पेड़ के नीचे आ पहुँचे |
जमीनपर आते ही तीनों ने रस्सी को छोड़ दिया और चारों ओर देखने लगे |
काले पेड़, काली जमीन, काले
पत्थर देखते हुए सोहम और वीरा अचंभित हो गये | देवयानी ने
कहा, "यह पर्बत पहले ऐसा नहीं था | देवराज इंद्रने पर्बत को श्राप देते हुए अपना वज्र इसपर चला दिया |
वज्र के प्रहार से यह पर्बत और यहाँ की सृष्टी, सब काले पड़ गये |" देवयानी बोल ही रही थी कि,
"कोई है... मेरी सहायता करो..." इस आवाज से तीनों चौंक
पड़े और आवाज की दिशा में देखने लगे |
दूसरा और अंतिम भाग कुछ ही दिनोंमें...