अबतक की कहानी...
शैतान राजा दुष्किर्ती का आतंक रोकने के लिए तीन वीर पुरुष प्रकट होकर राजा दुष्किर्ती से घमासान युद्ध करते हैं | हजारें साल बीत जाते हैं और एक रात जंगल में भेड़ियों से बचकर भागती हुई देवयानी को सोहम और शिवम बचा लेते हैं | देवयानी उन्हें दुष्किर्ती और उन तीन महावीरों की कथा सुनाती है और वह खुद रौशनी के मंदिर की देवी है जो मनुष्यरूप में तलवार के टुकड़ों को मंदिर वापस ले जाने आई है, यह भी कहती है | शिवम का इसपर विश्वास नहीं होता लेकिन वापस जाते वक्त वह एक काले धुएँ में लिपटे टुकड़े को छू लेता है और उसी में गायब हो जाता है |
सेहम को देवयानी की बात पर विश्वास हो जाता है | थकान ती वजह से दोनों तंबू में रात काट लेते हैं | सुबह होने से कुछ क्षण पहले रुहानी जानवर फिर से हमला कर देते हैं | तब देवयानी अपनी दैवी शक्तिसे उन्हें नष्ट कर देती है | सोहम और देवयानी समुद्रतटपर पहुँचते हैं | वहाँ एक गुफा में देवयानी के स्पर्श से ऋषी आदित्यनाथ पत्थर की शीला से मुक्त हो जाते हैं | विलीन होते होते वे सोहम को शस्त्रों से लैस एक नाव भेंट करते हैं | यमराज के श्राप के कारन गायब हुई लहरोंवाले समुद्र में नाव चलने लगती है तभी एक विशालकाय रुहानी दानव नावपर हमला करता है |
देवयानी और सोहम उस दानव से लढ़ रहे होते हैं तभी लुटेरों के सरदार की बेटी वीरा उनकी मदद के लिए पहुँच जाती है | तीनों मिलकर उस दानव को हरा देते हैं | पानी के अंदर से आती लाल रौशनी को देख, तीसरे टुकड़े के वहाँ होने का अनुमान लगाकर सोहम पानी में कूद जाता है | वहाँ एक बड़ी सी रुहानी मछली को वहीं फँसे खंजर से सोहम खत्म करता है और तलवार का दूसरा टुकड़ा लेकर वापस सतहपर आता है | सोहम के हाथ में रखे खंजर को वीरा पहचान जाती है और अपने बाबा की खोज में उनके साथ काले पर्बत ती ओर चल देती है | काले पर्बत तक पहुँचते ही नावपर हमला होता है | नाव टूट जाती है लेकिन तीनों बचकर जमीनपर उतर जाते हैं | वहींपर मदद की पुकार सुनकर तीनों चौंक जाते हैं |
धीरे धीरे वे दानव पास आने लगे | तब देवयानी ने आँखें बंद कर अपने हाथ जोड़े | सफेद रौशनी की एक तरंग उठी और देवयानी के शरीर को घेरने लगी | धीरे धीरे देवयानी जमीन से ऊपर उठने लगी | कुछ क्षणों में देवयानी ने अपनी आँखे खोलीं तो उसकी संपूर्ण आँखें सफेद हो गयी थी | उसने अपने दोनों हाथ खोले और उनसे निकलती हुई सफेद किरनें जब उन दानवोंपर पड़ी, तो उसी क्षण विस्फोट के साथ वे दानव भस्म होने लगे | जब सारे दानव खत्म हो गये, तब देवयानी ने फिरसे आँखें बंद कर हाथ जोड़े | वह फिर से मनुष्य रूप में परिवर्तित हो गयी लेकिन वह अपने आपको सँभाल ना सकी और लड़खड़ाने लगी | युवक ने तुरंत ही देवयानी को सँभाला और उसे खड़ी होने में सहायता की | युवक ने कहा, "आपने मेरी सहायता की इसलिए धन्यवाद | मैं..." युवक बोल ही रहा था कि देवयानी की नजर उसके हाथ पर पड़ी |
एक बड़ीसी काली तलवार हवा में खड़ी थी | काला धुँवा उस तलवार को घेरे हुए था और उससे लाल चिंगारियाँ निकल रहीं थीं | उस युवक ने तलवार को थामा और काले धुँए का बादल और घना होकर युवक को घेरने लगा | युवक की काया का रंग बदलकर हलका काला पड़ गया | उसकी आँखें लाल हो गयीं | वह दहाड़ मारकर हँसने लगा | हँसते हुए उसकी आँखों से भी काला धुँवा निकल ने लगा | यह सब इतनी जल्दी हो रहा था कि देवयानी, वीरा और सोहम कुछ समझ ना सके | तीनों ने होश सँभाला तो उस युवक ने हँसना बंद कर दिया था और वह बोल पड़ा, "मैं काली हूँ | दुष्किर्ती का पुत्र | जब वह तीन मूर्ख पिताजी को काली दुनिया में कैद कर रहे थे, तब उन्होंने इस तलवार से एक किरन हवा में छोड़ दी | वह किरन मैं था | वह किरन यहाँ इस पर्बतपर एक फल में चली गयी और मैं उस फल में कैद हो गया | तलवार का यह तीसरा टुकड़ा भी यहीं पर आ गिरा | काली दुनिया में कैद मेरे पिताजी और यहाँ उस फल में कैद मैं, हम दोनों विवश थे | केवल मैं ही था जो पिताजी को मुक्त कर सकता था |
सदियों की प्रतीक्षा के बाद वह दिन आया जब सोहम का तीर फल को काटता हुआ टहनीपर लगा और फल के गिरते ही मैं उसकी कैद से आजाद हुआ | उस समय भी आज ही का दिन था जब मेरा जनम हुआ | इतने समय के पस्चात आज का यह दिन फिरसे आया है | और अब..." कहते कहते काली ने तलवार का रुख देवयानी की ओर किया | तलवार से लाल किरनें निकली और देवयानी को घेरने लगीं | सोहम और वीरा उसकी मदद करने आगे आये लेकिन काली ने अपने दूसरे हाथ से लाल किरनें भेज सोहम और वीरा को दूर फैंक दिया | वहाँ देवयानी खींचती हुई काली के पास जाने लगी | जाते जाते सोहम और वीरा की ओर देखकर वह बोली, "वीरा, सोहम तुम दोनों को यह सब खत्म करना होगा | मेरी शक्तियाँ आज के दिन के लिए लुप्त हो गयीं हैं | आज दसवाँ दिन है | उस दुष्किर्ती का अंत आज ही करना होगा |" देवयानी काली की गिरफ्त में चली गयी | काली ने उसी वक्त तलवार की मदद से काली दुनिया के द्वार खोल दिये और कैद देवयानी समेत काली दुनिया में चला गया |
सोहम और वीरा ने एक-दूसरे को देखा | सब इतनी जल्दी हो गया, कि वे दोनों कुछ नहीं कर पायें | वीरा ने कहा, "तलवार तो काली को मिल गयी थी, फिर देवयानी को क्यौं ले गया वह..!! क्या रहस्य हो सकता है इसका..!!" सोहम कुछ कहे इससे पहले, "बड़ी शक्तीयों के साथ बड़ी कुर्बानिया जुड़ी होती हैं..." गुफा में ऋषी ने कहा यह वाक्य उसे याद आया | वीरा की ओर देखते हुए सोहम ने कहा, "वीरा, आज दसवाँ दिन है | दुष्किर्ती को उसकी शक्तियाँ प्राप्त हो गयीं हैं | लेकिन लगता हे उन्हें पूरी तरह प्राप्त करने के लिए दुष्किर्ती को कुर्बानी देनी होगी | अर्थात बली देनी होगी | देवयानी को इसीलिए तो नहीं... वीरा, हमें देवयानी की सहायता करने उस काली दुनिया में जाना होगा |" वीरा ने सिर हिलाया और दोनों द्वार की ओर मुड़े | काली दुनिया का वह द्वार धीरे धीरे बंद होने लगा | दोनों ने अपने भागने की गति बढ़ा दी | तभी उन दोनों के इर्द-गिर्द विस्फोट होने लगे |
दोनों ने देखा तो चारों ओर से पथरीले दानवों और राक्षसी पेड़ों की सेना उनकी तरफ चली आ रही थी | वीरा ने कहा, "यह सब हमें अंदर जाने से रोकने के लिए आ रहे हैं | हम यहाँ उलझे रहेंगे तो वह द्वार बंद हो जाएगा और हम देवयानी तक नहीं पहुँच पाएँगे | क्या करें हम..!!" सोहम ने कुछ पल सोचा | फिर अपने तुणीर में से कुछ तीर निकालकर अपने शरीर के कपड़े का कुछ हिस्सा फाड़कर उन तीरों को ढँक दिया | वीरा समझ गयी | उसने तुरंत चिंगारियाँ पैदा कर कपड़ों पर डालीं | जलती हुई मशाल की भांति वे तीर दिखने लगे | सोहम ने बिना समय गवाँए तीरों को एकसाथ द्वार के निकट पहुँचे दानवोंपर चला दिया | विस्फोट के साथ दानवों के टुकड़े सब जगह बिखर गये | अपने और द्वार के बीच अब कोई नहीं है यह देखकर सोहम जोरसे चिल्लाया, "वीरा... अभी..." विस्फोटों से बचते बचाते सोहम और वीरा बंद होते द्वार की ओर लपके | द्वार बंद होने ही वाला था, कि दोनों अंदर कूद गये |
चुंबक की तरह वे दोनों खींचे चले जा रहे थे | कुछ ही पलों में जमीन नजर आने लगी | सतहपर पहुँचते ही गुलाटी मारते हुए वीरा और सोहम खड़े हो गये | दोनों ने चारों ओर देखा तो एक अलग ही दुनिया वहाँ नजर आ रही थी | सब तरफ अंधेरा था | कहीं पहाड़ों से ज्वालामुखी फट लहे थे | कहीं आग के गोले बरस रहे थे | जहाँ सोहम और वीरा खड़े थे, वहाँ कुछ ही दूरी पर लावा का एक विशाल समुद्र फैला हुआ था और बीच बीच में लावा के बड़े बड़े बुलबुले फूट रहे थे | हवा तो चल रही थी, लेकिन उन दोनों को उससे भी तेज गर्मी का एहसास हो रहा था | वीरा ने कहा, "यहाँ तो हर तरफ आग ही आग है | ना कोई इंसान दिख रहा है और ना ही कोई दानव |" "वह भी आ जाएँगे | इतनी शीघ्रता क्यौं..??"
वीरा बोल ही रही थी, कि इस आवाज से दोनों चौंक पड़े | दोनों ने आवाज की तरफ देखा तो सामने काली खड़ा था | काली को देखते ही वीरा और सोहम ने अपनी अपनी तलवारें निकाल लीं | सोहम ने पूछा, "कौन सी जगह है यह..?? और देवयानी कहाँ है..??" हँसते हुए काली ने कहा, "पाताल लोक और धरती के बीच है यह काली दुनिया | इस शापित, अंधेरी दुनिया के शासक हैं मेरे पिताजी राजा दुष्किर्ती | मेरे पीछे वह चट्टान दिख रही है | उसके पीछे पिताजी यज्ञ की तैयारी कर रहे हैं | देवयानी भी मूर्छित अवस्था में वहीं पर है | यज्ञ पूरा होते ही पिताजी देवयानी की काया में प्रवेश करेंगे | तब, अनंत काल ते लिए वे अमर हो जाएँगे, हा...हा...हा..." काली जोर जोरसे हँसने लगा | सोहम और वीराने अपनी तलवारें पकड़े एक-दूसरे को देखा और कालीपर हमला कर दिया |
दोनों को हमला करते देख कालीने अपनी हँसी रोक ली | देखते ही देखते उसी आँखें लाल हो गयीं और उसके दोनों हाथों में एक एक शस्त्र आ गया | तलवार, भाला, तीर-कमान, खंजर, इन सबसे अलग यह दोनों शस्त्र बड़े, नौकीले और काँटोंभरे थे | वीरा और सोहम बारी बारी से कालीपर वार कर रहे थे और काली उन्हें पछाड़ रहा था | बहुत देर यह युद्ध चलता रहा | वीरा और सोहम दोनों घायल हो गये थे | उनके जख्मों से खून आने लगा था | काली हँसते हुए बोला, "हा...हा...हा... हार मान लो... तुम कुछ नहीं कर सकते... यज्ञ बस शुरू ही होनेवाला होगा | हा...हा...हा..." वीरा और सोहम ने एक-दूसरे को देखा और सिर हिलाया | दोनों की आँखों ने इशारा किया और दोनों एकसाथ कालीपर टूट पड़े | दोनों ने पूरी ताकत लगाकर काली के शस्त्र गिरा दिये | फिर तलवारों से वार करते करते काली का पेंट और छाती छलनी कर दी | घावों से बहता काला खून और वेदना के कारन काली का शरीर फट गया | काली को नष्ट हुआ देख सोहम और वीरा चट्टान की ओर भागे |
चट्टान चढ़कर दोनों ने दूसरी तरफ देखा | खुले मैदान में जगह जगह जलते हुए, बिना पत्तों के काले पेड़ थे | कहीं लावा बह रहा था और उसमें विस्फोट हो रहे थे | मैदान के अंत में एक बड़ीसी पत्थर की शीलापर सलाखों में जकड़ी हुई देवयानी लेटी हुई थी | शीला के पीछे लाल आँखोंवाली, काले धुएँ में लिपटी और हाथ में काली तलवार पकड़े एक रुहानी आकृती नाच रही थी | चट्टान के पास ही पथरीले दानवों की एक टुकड़ी तैनात थी | सोहम और वीरा ने एक-दूसरे को देखा | सोहम ने तुरंत तीर निकाले | वीरा ने फिर आग पैदा कर तीरों को लगा दी | मशाल की तरह लग रहे उन तीरों को सोहम ने दानवों की टुकड़ी पर चला दिया | एकसाथ दो-तीन धमाके हुए और सारे दानव टूटकर बिखर गये | उस आकृती और देवयानी ने धमाकों की आवाज की ओर देखा तो सोहम और वीरा तेजी से चट्टान उतर रहे थे |
उन्हें देख देवयानी ने कहा, "दृष्किर्ती, बंद कर तेरा यह खेल | तू कभी विजयी नहीं हो सकता | कभी अमर नहीं हो सकता |" दहाड़ मारकर हँसता हुआ दुष्किर्ती बोला, "हा...हा...हा... कौन रोकगा मुझे... अब तुम्हारा देवलोक का यह पवित्र शरीर प्राप्त कर, मैं और शक्तिशाली हो जाऊँगा | कीड़ों की भाँति लगनेवाले यह मानव क्या रोकेंगे मुझे... हा...हा...हा..." यह कहते कहते दुष्किर्तीने तलवार का रुख उनकी तरफ किया | तलवार से निकलती लाल रौशनी से रुहानी जानवर और दानव निकल आये और वीरा एवं सोहम की तरफ बढ़ने लगे | रुहानी ताकदोंवाले जानवरों और दानवों का मुकाबला करते हुए वीरा और सोहम आगे बढ़ रहे थे | सारे जानवर और दानव नष्ट करने के बाद सोहम और वीरा जैसे ही आगे बढ़े, उसी वक्त, "बेटी... वीरा..." इस पुकार से दोनों रुक गये | वीरा ने मुड़कर देखा तो उसके पिताजी सामने खड़े थे |
तलवार नीचे कर वीरा अपने पिता की तरफ बढ़ी और उन्हें गले लगा लिया | सोहम उनकी तरफ बढ़ने ही वाला था, कि एक हाथ उसके काँधेपर आया | सोहम ने देखा तो सामने शिवम खड़ा था | शिवम ने कहा, "भाई, मैं तो यहाँ हूँ | तुम वहाँ क्यौं जा रहे हो..?? मेरे लिए तुम यहाँ आये थे | अब हम मिल गये हैं | चलो, यहाँ से चलें |" वहाँ वीरा अपने पिता से गले लगकर तुरंत दूर हट गयी | उसने कहा, "बाबा... आप इतने ठंड़े क्यौं लग रहे |" वीरा के पिता के चेहरेपर हलकीसी मुस्कान आ गयी | वीरा का हाथ पकड़े वह कहने लगे, "वीरा, चलो यहाँ से | अब यहाँ रहने की को आवश्कता नहीं |" वीरा को उसके पिता का हाथ और भी ठंड़ा लगने लगा | उसने अपने आपको छुड़ाने की कोशिश की लेकिन हाथ की पकड़ और मजबूत हो गयी | तभी सिर्फ हाथ के जोर से वीरा के पिता ने उसे धकेल दिया तो वीरा दूर जाकर गिर पड़ी |
दूसरी ओर सोहम ने जब शिवम का हाथ अपने हाथ में लिया तो वह सोहम को ठंड़ा महसूस हुआ | तुरंत दूर होकर सोहम ने कहा, "शिवम... तुम यह कह रहे हो... दूसरों की मदद करने तुम हमेशा आगे रहते हो और यहाँ..." शिवम क्रोधित होकर बोला, "सोहम, चलो यहाँ से | तुझे आना ही होगा |" शिवम की यह बात सुनकर सोहम की आँखे बड़ी हो गईं | वह पीछे पीछे जाने लगा तो शिवम ने अपने पैर से सोहम की छातीपर मारा | वह मार इतनी शक्तिशाली थी, कि सोहम दूर फैंका गया | सोहम और वीरा दूर फैंके जानेपर एक-दूसरे के पास आकर गिर पड़े | एक-दूसरे को देखकर दोनों खड़े हो गये | सोहम ने कहा, "वीरा, हमारे अपने अब अपने नहीं रहे | यह दोनों अब उस दुष्किर्ती की दुनिया के हो चुके हैं | वीरा ने सिर हिलाते हुए कहा, "तुम ठिक कह रहे हो सोहम, लेकिन मैं अपने बाबापर वार नहीं कर सकती |" सोहम समझ गया | उसने कहा, "तो मैं तुम्हारे बाबा का सामना करता हूँ और तुम शिवम को सँभालो |" दोनों इशारा करते हुए एक-दूसरे की ओर पीठ कर तलवार निकालकर खड़े हो गये |
किसी दानव के हाथ पर वार हो रहा था | किसी जानवर की गर्दन कट रही थी | वीरा और सोहम एकसाथ लढ़ रहे थे, लेकिन वह रुहानी सेना खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी | तभी जोर की आवाज के साथ वह पत्थर की शीला टूट गयी और सलाखों में जकड़ी देवयानी हवा में तैरने लगी | आवाज आते ही सोहम, वीरा और उस रुहानी सेना ने आवाज की तरफ देखा | दुष्किर्ती ने तलवार को देवयानी के हाथ में पकड़ा दिया और दहाड़ मारकर हँसता हुआ वह देवयानी के शरीर में प्रवेश कर गया | चारों ओर एक कंपन सा होने लगा और देवयानी का शरीर काला पड़ गया | कुछ पल के लिए निश्तेज हुई देवयानी ने आँख खोली और हवा में ही उठकर खड़ी हो गई |
उसका पूरा शरीर काला पड़ गया था | उसकी नीली शीतल आँखों की जगह आग उगलती लाल आँखों ने ले ली थी | उसने अपने हाथ की तलवार को सलाखोंपर रखा तो वे सलाखें पूरी तरह पिघल गयी | देवयानी के मुख से दुष्किर्ती की आवाज आने लगी, "हा...हा...हा... अब में अनंत काल के लिए अमर हो गया हूँ | तुच्छ मानव... तुम मुझे रोकने आए थे... अब इस देवयानी की दैवी शक्ति प्राप्त कर मैं सारे ब्राम्हांड पर अपना काला राज्य स्थापित कर दूँगा... हा...हा...हा..." यह कहकर देवयानी के अंदर के दुष्किर्ती ने देवयानी का हाथ बढ़ाया | इतनी देर तक रुकी हुई वह रुहानी सेना फिर आगे बढ़ी और दुष्किर्ती मंत्र का उच्चार करने लगा |
तभी एक तेज सफेद रौशनी देवयानी के सीने से निकली | रौशनी ने उस रुहानी सेना को पुतले की तरह एकही जगह ठहरा दिया | सोहम और वीरा, यह कैसे हुआ, यह सोच ही रहे थे, कि देवयानी के सीनेपर एक सफेद रौशनी नजर आई | दोनों ने वहाँ देखा तो देवयानी का असली चेहरा नजर आ रहा था | देवयानी ने कहा, "सोहम, यह पापी दुष्किर्ती मेरी शक्तियाँ प्राप्त करने के लिए मंत्रजाप कर रहा लेकिन मेरी शक्तियों ने उसे मेरी कायापर संपूर्ण कब्जा नहीं दिया है | मेरा कुछ अंश अब भी बाकी है | इस युद्ध के रोकने का केवल एकमात्र उपाय है दुष्किर्ती का अंत जो उसी की तलवार से होगा | शीघ्रता से इस तलवार को मेरे हाथ से अलग करो सोहम |" सोहम ने तुरंत धनुष उठाया और पास ही पड़े एक दानव के कटे हुए हाथ को उसपर चढ़ाया | देवयानी के हाथ का निशाना साधकर धनुष चला दिया |
उस हाथ ने देवयानी के हाथ को झटका दिया और तलवार हवा में जा उड़ी | जैसे ही तलवार हाथ से छूटी, वैसे ही दुष्किर्ती का मंत्रजाप रुक गया | दुष्किर्ती कुछ करे इससे पहले ही सोहम ने हवा में कूदकर तलवार को दोनों हाथों से लपक लिया | तलवार सोहम के हाथों में आते ही देवयानी के शरीर में बसा दुष्किर्ती दहाड़ मारकर चिल्लाया, "नहींऽऽऽऽऽ..." और समय वहीं पर रुक गया | तलवार को घिरा काला धुआँ धिरे धिरे कम होता गया | तलवार से नीली रौशनी निकलने लगी | रौशनी ने तलवार को जैसे ही घेरा, वैसे ही तलवार का काला रंग लुप्त हो गया और तलवार सफेद रौशनी में चमकने लगी | थमा हुआ वक्त फिर से चलने लगा | रुहानी सेना की एक टुकड़ी जैसे ही पास आई, सोहम ने तलवार चला दी |
पूरी टुकड़ी एक ही वार में भस्म हो गयी | यह देखते ही सोहम ने एक के बाद एक वार करने शुरू किये और कुछ ही क्षणों में पूरी सेना भस्म हो गयी | यह देख दुष्किर्ती आगबबूला हो गया | उसने कहा, "क्षूद्र मानव... तूने मेरी तलवार प्राप्त कर मेरी सेना नष्ट कर दी तो क्या तुम विजयी हो जाओगे... मैं अब भी अमर हूँ... अजिंक्य हूँ... हा...हा...हा..." यह कहकर दुष्किर्ती फिर मंत्रजाप करने लगा | तभी उसके सीनेपर फिर सफेद रौशनी नजर आई और वहाँ से देवयानी ने कहा, "सोहम, अब वह घड़ी आ गयी है जब सारे ग्रह अपने परम स्थान पर हैं | दुष्किर्ती की तलवार भी तुम्हारे हाथ में है | यही उचित समय है | दुष्किर्ती का अंत करना है तो तुम्हें यह तलवार मेरे सीने के पार करनी होगी | विचार मत करो सोहम, याद करो ऋषि आदित्यनाथ ने क्या कहा था |
जमीनपर एक पलंगपर बिछे मखमली गद्देपर देवयानी लेटी हुई थी और नीली रौशनी में लिपटी वह तलवार हवा में तैर रही थी | सोहम और वीरा ने पहले एक-दूसरे को फिर चारों ओर देखा | देवयानी को देखते ही दोनों उसके पास पहुँचे | दोनों की आँखों में आँसू थे | तभी एक आवाज उस जगह गूँज उठी, "धीरज धरो पुत्र, तुम अब रोशनी के मंदिर में हो | सब ठिक होगा |" सोहम और वीरा ने आवाज की दिशा में ऊपर देखा तो तलवार के पीछे तीन दिव्य पुरूष प्रकट हुए थे | तीनों एकसाथ बोल पड़े, "तुम दोनों ने अतुलनीय साहस और धैर्य का प्रदर्शन कर उस दुष्किर्ती का अंत किया | इस युद्ध में तुम दोनों ने तुम्हारे अपनों को खो दिया | परंतु, सबसे बड़ी कुर्बानी दी, देवयानी ने | दुष्टों के विनाश के लिए उसने अपने प्राण त्याग दिये |" यह कहते हुए तीनों ने देवयानी की ओर अपना हाथ बढ़ाया | कुछ ही क्षणों में देवयानी ने आँखे खोली और वह खड़ी हो गयी |
देवयानी को जिंदा देख सोहम और वीरा दोनों खुश हो गये | तीनों महापुरुष बोले, "देवयानी, तुम्हारा कार्य पूरा हो गया | अब तुम पुनह देवलोक के लिए प्रस्थान कर सकती हो | वीरा, तुम एक लुटेरन हो | लेकिन दुष्किर्ती से युद्ध के दौरान तुमने अपने सारे पार धो दिये हैं | तुम अब एक राज्य की महारानी बनोगी और तुम्हारे सारे साथी, तुम्हारी प्रजा बनकर तुम्हारे आधीन रहेंगे | और सोहम, तुमने जो असमान्य साहस का परिचय दिया है, इससे हम प्रसन्न हैं | उपहारस्वरूप यह दिव्य तलवार हम तुम्हें भेंट देते हैं | मन के विचारों को ग्रहण करनेवाली यह तलवार अबतक दुष्किर्ती के काले मन के साये में जकड़ी हुई थी | परंतु तुम्हारे सच्चे और निर्मल मन का स्पर्श पाकर वह फिर से उसके मूल स्वरूप में आ गयी है | इस तलवार के होते तुम्हें कोई परास्त नहीं कर सकता | कल्याणमस्तु |" इतना कहकर तीनों महावीर लुप्त हो गये | वीरा और सोहम ने देवयानी की ओर देखा तो सफेद और नीली रैशनी की लकीरें उसे घेरे हुए थी | देवयानी ने दोनों की ओर मुड़कर हाथ जोड़े | रौशनी बढ़ती गयी और देखते ही देखते देवयानी रौशनी में समा गयी और वह मंदिर फिर से सफेद पवित्र रोशनी में नहा उठा |
समाप्त.
@ अनिकेत परशुराम आपटे.
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